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Saturday, August 24, 2013

मौलाना के राज में

जजिया कर दे कर ही सही किन्तु तीर्थयात्रा पर तो हिंदु औरंगजेब के शासनकाल में भी जाते ही थे. भारत के ज्ञात इतिहास में संभवतः ऐसा कोई अवसर न आया होगा जब हिन्दू संतों को धर्मनगरी अयोध्या के परिक्रमा से भी रोका गया हो. चौरासी कोस परिक्रमा की परंपरा युगों से चली आ रही है. हिन्दू धर्म में इसका एक विशेष महत्व है. साधू-संत जिन रास्तों से होकर परिक्रमा करना चाहते हैं वही परिक्रमा का पारंपरिक रास्ता है. जिन चालीस पड़ावों पर परिक्रमा करते हुए संत रुकेंगे, वे सभी युगों से चले आ रहे परंपरा में निश्चित पड़ाव हैं. रही बात परिक्रमा के समय के शास्त्रोचित होने का तो यह तो अपने आप में हास्यास्पद है और सपा सरकार का सूरज को दिया दिखने जैसा दुस्साहस है. आखिर सरकार किस अधिकार से विभिन्न धर्मपीठों के महंतों और शंकराचार्यों से यह प्रश्न कर रही है कि परिक्रमा के लिए यह समय शास्त्रोचित है अथवा नही? शास्त्रोचित होने का निर्णय धर्माचार्य करेंगे या सरकार करेगी? और यदि शास्त्रोचित नहीं भी हो तो सरकार को इसमें भला क्यों हस्तक्षेप करना चाहिए?
17 अगस्त को विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ मार्गदर्शक श्री अशोक सिंघल के नेतृत्व में संतों का एक प्रतिनिधि मंडल उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तथा उनके पिता और प्रदेश के ‘महामुख्यमंत्री’ मुलायम सिंह यादव से मिला. अन्य बातों के अतिरिक्त प्रतिनिधि मंडल ने पूर्व घोषित चौरासी कोस परिक्रमा की औपचारिक जानकारी सरकार को दी और उचित प्रशासनिक प्रबंध का अनुरोध किया. जैसा की श्री अशोक सिंघल ने बताया है कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके पिता का इस मुद्दे पर रुख सकारात्मक था और उन्होंने उचित प्रशासनिक व्यवस्था का आश्वासन भी दिया था. लेकिन ‘यू टर्न’ के लिए जगत कुख्यात ‘नेताजी’ शीघ्र ही पलट गए. उचित प्रशासनिक प्रबंध को कौन कहे उन्होंने तो परिक्रमा पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया.
परिक्रमा पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए उत्तरप्रदेश की सरकार ने जो आधार बताया वह स्वयं में घोर आपत्तिजनक और संतों का अपमान करने वाला है. 20 दिन की इस यात्रा में देश के 40 में से 36 प्रान्तों के संत हिस्सा लेंगे. एक प्रान्त के संत मात्र एक दिन यात्रा करेंगे. इस प्रकार अधिकाधिक 200 संत प्रत्येक दिन पदयात्रा में हिस्सा लेंगे. सरकार का यह कहना कि संतों के यात्रा से कानून-व्यवस्था का संकट खड़ा होगा, अपने आप में हैरान कर देने वाला है. क्या हिन्दू संत हिंसक प्रवृति के हैं? क्या इन संतों का कोई आपराधिक रिकार्ड है? क्या प्रयाग में हुए कुम्भ में संतों ने कोई भडकाऊ भाषण दिए थे? क्या वहाँ उन्होंने किसी प्रकार से शासन व्यवस्था के लिए कोई समस्या खड़ी की थी? आखिर यह मान लेने का आधार क्या है कि चौरासी कोस परिक्रमा से कानून-व्यवस्था का संकट खड़ा होगा? और कानून-व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर देश में हिंदुओं के मौलिक अधिकार को कैसे छिना जा सकता है? होने को तो उत्तरप्रदेश में प्रत्येक माह कोई दंगा होता है. ये दंगे किन धार्मिक परिक्रमाओं का परिणाम हैं? दंगे तो इस देश में प्रत्येक मुहर्रम पर हुए हैं. लेकिन ताजिया निकलने की परंपरा तो निर्बाध जारी है. निस्संदेह कानून-व्यवस्था बनाये रखना राज्य सरकार का कर्तव्य है (जिसके पालन में समजवादी पार्टी की सरकार अबतक पूर्णतया विफल रही है). लेकिन इस नाम पर वह हिंदुओं के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकती.
देश के शक्तिशाली ‘सेकुलर’ बुद्धिजीवी वर्ग का परिक्रमा के विरोध में इस आधार पर वातावरण खड़ा करना कि इसपर राजनीति होगी, कम हास्यास्पद नहीं है. इस देश में तो राजनीति फिल्मों पर होती है, पुस्तकों पर होती है, नाटकों के मंचन पर होती है, समाचारपत्रों में छपे लेख पर भी होती है. पड़ोसी देश बांग्लादेश में किसी दुर्दांत अपराधी को मृत्युदंड मिलने पर भी होती है और डेनमार्क के किसी विवादित और अनदेखे कार्टून पर भी होती है. अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका टाइम्स के कवर स्टोरी पर भी होती है और सलमान रुश्दी जैसे लेखकों पर भी होती है. चीन के घुसपैठ पर होती है तो पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय सैनिकों के हत्या पर होती है. बाढ़ पर भी होती है और सूखे पर भी होती है. और तो और बर्मा के आतंरिक झगडों पर भी होती है. तो प्रश्न है कि राजनीति से बचने के लिए आखिर किन-किन चीजों पर प्रतिबन्ध लगेगा? और एक लोकतान्त्रिक देश में राजनीति नहीं होगी तो क्या होगा? ऐसी हर एक बात जिससे जनमत प्रभावित होगा उसपर राजनीति होगी ही. यद्यपि गन्दी राजनीति से बचना चाहिए जिसे मुलायम बढ़ावा दे रहे हैं.
मात्र 200 संतों की परिक्रमा को रोकने के लिए हजारों की संख्या में सुरक्षाबल तैनात कर देना कहीं से भी स्वाभाविक नहीं लगता. वस्तुतः देश की राजनीति जिस दिशा में जा रही है, उसमे मुलायम को यह अंदेशा है कि उनका मजबूत मुस्लिम वोटबैंक कांग्रेस की तरफ जा सकता है. इस नुकसान को रोकने के लिए वे पुनः अपने मौलाना वाले अवतार में जाना चाहते हैं और अपनी राजनीति साधने के लिए हिन्दू संतों को एक प्रकार से दंगाई घोषित करने पर तुले हुए हैं.
उल्लेखनीय है कि प्रस्तावित चौरासी कोस परिक्रमा विश्व हिन्दू परिषद के तत्वाधान में होने जा रही है. विश्व हिन्दू परिषद का यह घोषित एजेंडा है कि वे अयोध्या में रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण चाहते हैं. चौरासी कोस परिक्रमा और आगे के कार्यक्रमों में विश्व हिन्दू परिषद इसके लिए जनमत जुटाने का प्रयास करेगी. मंदिर के लिए जनमत खड़ा करना कोई गैरकानूनी कार्य नहीं है. विश्व हिन्दू परिषद नब्बे के दशक में भी मंदिर के समर्थन में जनमत खड़ी कर चुकी है. रामजन्मभूमि पर मंदिर पुनर्निर्माण के लिए विगत 480 वर्षों से संघर्ष जारी है. 2010 के इलाहबाद उच्च न्यायलय के निर्णय से तो यह स्पष्ट हो चूका है कि विवादित भूमि ही राम की जन्मभूमि है. आदर्श स्थिति तो यही होती कि वह भूमि मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं को सौंप दिया जाता. किन्तु मामला अब उच्चतम न्यायलय में है. उच्च न्यायलय से तो निर्णय आने में 60 वर्ष लग गए. संभव है कि उच्चतम न्यायलय में यह विषय 120 वर्ष तक लटका रहे. यह भी सम्भावना है कि 120 वर्षों बाद भी जब निर्णय आये तो न्यायालय में अपील दाखिल कर दी जाए और इस विषय पर अंतिम निर्णय 240 वर्षों बाद भी नहीं आये. हमारे न्याय व्यवस्था की जो स्थिति है उसमे कुछ भी असंभव नहीं है.
इसतरह यह तो लगभग स्पष्ट है कि रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण संसद में कानून बनाकर ही हो सकता है. संसद में कानून बनाने के लिए यह आवश्यक है कि वहाँ 272 रामभक्त संसद चुनकर भेजे जाएँ. आखिर बाबर के भक्त तो राम मंदिर पर आनेवाले विधेयक को समर्थन देंगे नहीं. देश में अबतक अधिकतम 200 ऐसे सांसद ही पहुँच सके हैं जो स्पष्ट रूप से भव्य मंदिर के पक्ष में खड़े थे. ऐसे में विश्व हिन्दू परिषद और संत समाज ऐसा जनमत खड़ा करना चाहती है जो 272 रामभक्त सांसदों को लोकसभा में पहुँचा सके. संतों की चिंता का कारण मंदिर मात्र ही नहीं है. भारत हिंदुओं के लिए पितृभूमि के साथ पुण्यभूमि भी है जिसकी चतुर्दिक दुर्दशा से देश के संत भी व्यथित हैं. जनजागरण और सामाजिक उत्थान के लिए यात्राओं का हमारे संतो का लंबा इतिहास रहा है. सनातन परंपरा की रक्षा के लिए आदिगुरु शंकराचार्य ने अखंड भारत को दो बार नापा था.
रामजन्मभूमि का मुद्दा न तो संतों के लिए राजनीतिक है न विश्व हिन्दू परिषद के लिए. यद्यपि जब भी आवश्यक हुआ है आदिकाल से ही संतों ने राजनीति को जनहित और राष्ट्रहित में प्रभावित करने का प्रयास भी किया ही है. अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्व वाली सरकार जब मंदिर मुद्दे का समाधान नहीं निकाल सकी तो विश्व हिन्दू परिषद ने उनकी तीखी आलोचना भी की और उनके सरकार के विरुद्ध आंदोलन भी हुए. मंदिर के आंदोलन से जुड़े अधिकतर संत और नेता अपने जीवन के आठवें और नवें दशक में हैं. उनके लिए एक तरह से यह अंतिम मौका है. यदि उत्तरप्रदेश सरकार चौरासी कोसी परिक्रमा को डंडे के बल पर रोक भी देती है तो आने वाले कुछ महीनों में अन्य आन्दोलनों के लिए देश को तैयार रहना चाहिए.

हिन्दू विभाजित है किन्तु पौरुषविहीन नहीं है. उसके प्राथमिकता की सूचि में ‘हिन्दू’ सबसे ऊपर न आता हो किन्तु बना हुआ अवश्य है. रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर हिंदुओं के लिए आज एकमात्र मुद्दा भले न हो लेकिन यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा अवश्य है. स्वघोषित सेकुलर दलों के मुस्लिम तुष्टिकरण से देश का युवा वर्ग व्यथित और सशंकित है. साधू-संतों के साथ यदि दुर्व्यवहार हुआ तो इसका दुष्परिणाम उत्तरप्रदेश में मुलायम और देश में कांग्रेस को भी भुगतना पड़ सकता है. कहीं ऐसा न हो कि मौलाना मुलायम के हाथ में मुसलमान तो रह जाए लेकिन हिन्दू ही निकल जाए. यदि कभी ऐसा होगा तो फिर मुसलमान के नेता मियां आजम खान होंगे और मुलायम उनकी पालकी उठाते नजर आयेंगे.

Monday, May 28, 2012

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर


28 मई 1883 को ‘स्वातंत्र्यवीर’ विनायक दामोदर सावरकर का जन्म हुआ था. आज देश, उनकी 130वी जयंती मना रहा है. यदि यह कहा जाए कि आधुनिक भारतीय इतिहास में जिस महापुरुष के साथ सबसे अधिक अन्याय हुआ, वह सावरकर ही हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी.
सावरकर ‘नाख़ून कटाकर’ क्रन्तिकारी नहीं बने थे. 27 वर्ष की आयु में, उन्हें 50-50 वर्ष के कैद की दो सजाएँ हुई थीं. 11 वर्ष के कठोर कालापानी के सहित उन्होंने कुल 27 वर्ष कैद में बिताए. सन 1857 के विद्रोह को ‘भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ बताने वाली प्रामाणिक पुस्तक सावरकर ने ही लिखी. ब्रिटिश जहाज से समुद्र में छलांग लगाकर ,सावरकर ने ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतर्राष्ट्रीयकरण किया. ‘हिंदुत्व’ नामक पुस्तक लिखकर सावरकर ने ही भारतीय राष्ट्रवाद को परिभाषित किया. जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद का विरोध, पूरी शक्ति से सावरकर ने ही किया. जातिवाद और अश्पृश्यता का जैसा विरोध वीर सावरकर ने किया था, वैसा तो कांग्रेस तब क्या, आज भी नहीं कर सकती है.
लेकिन देश उन्हें कैसे याद करता है?  भारत रत्न प्राप्त कर चुके 41 महानुभावों के सूचि में वीर सावरकर का नाम नहीं है. उनके जन्मदिन पर संसद में उनके चित्र पर माल्यार्पण करने के लिए सरकार का कोई प्रतिनिधि नहीं होता है. सेक्युलरिज्म के स्वयम्भू दूत मणि शंकर अय्यर ने तो सेल्युलर जेल से भी सावरकर की यादों को मिटने का प्रयास किया जहाँ वीर सावरकर ने कालापानी की सजा काटी थी. अपनी चमड़ी बचाने के लिए सावरकर के लंबे और एतिहासिक भाषण के एक वाक्य को उठाकर उन्हें ‘हिन्दू जिन्ना’ बनाने की कोशिश होती रही है और उन्हें विभाजन के लिए भी जिम्मेवार ठहराने की कोशिश होती रहा है. मानो भारतीय जनमानस के ‘स्वयम्भू’ प्रतिनिधि सावरकर ही रहे हों. जबकि सत्य तो यही है कि सावरकर ने अंत तक विभाजन को स्वीकार नहीं किया.
सावरकर को बदनाम करने के निकृष्ट अभियान में भारत के तथाकथित वामपंथी और गांधीवादी बुद्धिजीवियों ने अपूर्व एकता का परिचय दिया. इन बुद्धिजिवियों ने सावरकर पर तीन मुख्य आरोप लगाये: 1)अंग्रेजों से माफ़ी मांगना, 2) दूसरा हिन्दू साम्प्रदायिकता का जनक होना, 3) गांधी के हत्या का षड़यंत्र रचना. आगे हम इन आरोपों की पड़ताल करेंगे.
सावरकर पर पहल आरोप है अंग्रेजों से क्षमा याचना का. यह ठीक है कि जब 1913 में जब गवर्नर-जनरल का प्रतिनिधि रेजिनाल्ड क्रेडॉक पोर्ट ब्लेयर गया तो सावरकर ने अपनी याचिका पेश की. यह ठीक है कि सावरकर ने खूनी क्राति का मार्ग छोड़कर संवैधानिक रास्ते पर चलने का और राजभक्ति का आश्वासन दिया लेकिन ज़रा गौर कीजिए कि सावरकर की याचिका पर क्रेडोक ने क्या कहा| क्रेडोक ने अपनी गोपनीय टिप्पणी में लिखा कि सावरकर को अपने किए पर जरा भी पछतावा या खेद नहीं है और वह अपने  ह्रदय परिवर्तन का ढोंग कर रहा है|’ उसने यह भी लिखा कि सावरकर सबसे खतरनाक कैदी है| भारत और यूरोप के क्रांतिकारी उसके नाम की कसम खाते हैं और यदि भारत भेज दिया गया तो वे उसे भारतीय जेल तोड़कर निश्चय ही छुड़ा ले जाऍंगे| इस याचिका के बाद भी सावरकर ने लगभग एक दशक तक काले पानीकी महायातना भोगी| यहाँ दो बातें समझना आवश्यक है. पहली यह कि कालापानी की सजा इतनी भयंकर हुआ करती थी कि वहाँ से कोई व्यक्ति जीवित वापस नहीं आता था. सावरकर के आदर्श वीर शिवाजी थे, उन्हें पता था कि राष्ट्र की सेवा के लिए जीवित रहना आवश्यक है. उन्हें यह भी अच्छी तरह पता था कि अंडमान द्वीप से निकलने का एकमात्र रास्ता यह  ‘हृदय-परिवर्तन’ ही है. इसलिए उन्होंने यह प्रयास किया यद्यपि असफल रहे.
यदि अंग्रेजों के सामने याचिका प्रस्तुत करना अपराध है तो कांग्रेस का एक भी बड़ा नेता ऐसा नहीं, जिसने इसका उपयोग नहीं किया हों. जहाँ तक राजभक्ति के आश्वासन की बात है तो गांधीजी ने तो कई बार राजभक्ति की शपथ ली थी और प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सरकार का साथ भी दिया था. जो वामपंथी बुद्धिजीवी सावरकर का उपहास करते रहे हैं उन्हें लेनिन और स्टालिन के कारनामों की जानकारी होनी ही चाहिए.
दूसरा आरोप सावरकर पर, हिन्दुवादी साम्प्रदायिकता के जनक होने का है. पहले तो यह तय हो कि इस धरा पर हिन्दू साम्प्रदायिकता जैसा कुछ है भी या नहीं. संप्रदाय का आशय होता है सम्यक प्रकारेण प्रदीयते इति सम्प्रदाय. अर्थात एक गुरु के द्वारा समूह को सम्यक रूप से प्रदान की गई व्यवस्था को ‘संप्रदाय’ कहते हैं. इस अर्थ में इस्लाम, इसाई, मार्क्सवादी, माओवादी, संप्रदाय हो सकते हैं. हिन्दू समाज के अंदर भी जैन, बौद्ध, सिक्ख, नाथ इत्यादि कई संप्रदाय हैं लेकिन स्वयम हिन्दू समाज ही एक संप्रदाय नहीं है. पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानववाद’ के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए कहा था कि ‘religion’ को भारतीय सन्दर्भ में धर्मं का समानार्थी बताना बहुत बड़ी भूल थी. ‘religion’, संप्रदाय का समानार्थी शब्द है, धर्मं का नहीं. इस गलत अनुवाद के कारण लोग अब धर्म और संप्रदाय को पर्यायवाची शब्द समझने लगे हैं. मानो ‘धार्मिक होना’ और ‘साम्प्रदायिक होना’ एक ही बात हों.
वीर सावरकर की लिखी एक लघु पुस्तक है ‘हिंदुत्व’. भारतीय जनमानस पर प्रभाव के दृष्टिकोण से देखें तो यह उनकी सबसे अधिक महत्वपूर्ण रचना है. यदि प्रति शब्द प्रभाव के गणित से देखा जाए तो ‘हिंदुत्व’ निश्चय ही मार्क्स के ‘कैपिटल’ से अधिक प्रभावशाली पुस्तक प्रमाणित हुई है. ‘हिंदुत्व’ भारतीय राष्ट्रीयता को परिभाषित करने वाली पहली पुस्तक है. सावरकर के विचारधारा के विषय में निर्मम थे. वे यथासंभव तथ्यपरक बने रहने की कोशिश करते थे. अपने पुस्तक ‘हिंदुत्व’ में सावरकर ने किसी का तुष्टिकरण नहीं किया है बल्कि कटु सत्य बताया है. हाँ, लगभग 90 वर्षों के पश्चात, आज उसमे से कितने तर्क प्रासंगिक रह गए हैं और कितने अप्रासंगिक, यह अलग प्रशन है. उन्होंने आर्यों के मध्य एशिया से भारत में आने की बात कही है क्योंकि उस समय तक यह प्रमाणित नहीं हुआ था कि सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में एक ही रक्त समूह के लोग बसते हैं और तब तक स्थापित मान्यता यही थी कि भारतीय आर्य बाहर से आये हैं. उन्होंने हिन्दू के परिभाषा में उन सभी संप्रदायों को शामिल किया है जिनकी पुण्यभूमि भारत ही है. लेकिन सावरकर मुसलमानों एवं ईसाईयों को हिन्दू स्वीकार करने से इनकार करते हैं और इसका आधार इनके पुण्यभूमि के भारत से बाहर होना है. उस समय में जो वैश्विक और विशेषकर भारतीय परिस्थितियां थी उसमे ‘पुण्यभूमि’ के लिए निष्ठा के आगे ‘पितृभूमि’ के लिए निष्ठा नगण्य थी.  ‘हिंदुत्व’ सन 1923 में लिखी गयी थी. उस समय खिलाफत आंदोलन चरम पर था. भारत की परतंत्रता के प्रति प्रायः उदासीन रहने वाला मुस्लिम समाज अपने पुण्यभूमि की रक्षा के लिए पूरी तरह उद्वेलित था. कांग्रेस और कांग्रेस के कारण हिंदू समाज भी खिलाफत के समर्थन में खड़ा था. जबकि इस आंदोलन के जोश में मुस्लिम समाज भारत में ही निजाम-ए-मुस्तफा कायम करने पर तुला हुआ था. उसी कालखंड में, केरल के मोपला में हिंदुओं का भीषण संहार हुआ और उनका सामूहिक धर्मान्तरण भी किया गया. उसी दौर में मुस्लिम लीग ने अफगानिस्तान के बादशाह को भारत पर कब्ज़ा करने का निमंत्रण दिया. ऐसे दौर में सावरकर राष्ट्रवाद को भला और कैसे परिभाषित करते? वे ‘इश्वर अल्लाह तेरे नाम’ कैसे गाते जबकि ‘अल्लाह के बंदे’, ‘इश्वर के भक्तों’ को मिटा कर भारत को ‘दारुल इस्लाम’ बनने पर तुले हुए थे? वे उपन्यास नहीं लिख रहे थे वरन भारतीय राष्ट्रवाद को परिभाषित कर रहे थे, तो क्या वीर सावरकर कर्णप्रिय मिथ्या लिखते या कटु सत्य? निस्संदेह उन्होंने कटु सत्य चुना. वीर सावरकर ने हिंदुत्व में लिखा भी है कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व में अभिन्न सम्बन्ध होने के बाद भी दोनों एक दूसरे का पर्याय नहीं हैं. उन्होंने कई बार  पर स्पष्ट किया है कि हिंदुत्व, हिन्दुइज्म (Hinduism) नहीं है.
तीसरा आरोप है उनपर, महात्मा गांधी के हत्या के षड़यंत्र में शामिल होने का. महात्मा गांधी की हत्या हिंदू महासभा के एक कार्यकर्ता ने की थी. निवर्तमान शासन ने संभवतः सोचा होगा कि क्यों न एक झटके में ही सभी हिंदुत्व समर्थ शक्तियों को समाप्त कर दिया जाये. इसीलिए गाँधी के हत्या के षड़यंत्र में वीर सावरकर को भी आरोपी बनाया गया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी. सावरकर भी गिरफ्तार हुए और गोलवलकर गुरूजी भी. लेकिन न्यायालय में यह प्रमाणित हुआ कि सावरकर गाँधी के हत्या के षड़यंत्र में शामिल नहीं थे वरन उन्हें गाँधी के हत्या के षड़यंत्र में आरोपी बनाने का षड़यंत्र हुआ था. सावरकर ससम्मान मुक्त किये गए (लेकिन हमें यही पढाया जाता है कि उन्हें ‘सबूतों के अभाव’ में छोड़ दिया गया. सबूत होने के बाद भी किसी को न्यायलय से मुक्त किया जाता हो तो हमें भी बताया जाए).
वीर सावरकर के विरुद्ध साजिशकर्ताओं को संभवतः पता रहा हो कि उन्हें सजा देने लायक कोई सबूत नहीं है. लेकिन वे हिंदुत्व के जनक को बदनाम करना चाहते थे. वीर सावरकर का राजनीतिक करियर यहीं समाप्त हो गया और हिंदू महासभा भी पुनः खड़ी नहीं हो सकी. आरएसएस के द्वितीय सरसंघचालक गोलवलकर गुरूजी ने कहा भी था कि गाँधी हत्या के आरोप के कारण संघ 30 वर्ष पीछे चला गया. वीर सावरकर और आरएसएस पर इस षड़यंत्र में शामिल होने का झूठा आरोप यह प्रमाणित करता है कि ‘गांधीवादियों’ ने गाँधी के चिता के साथ ही गांधीवाद को भी जला दिया था.
भारतीय राजनीति में वीर सावरकर की तुलना महात्मा गाँधी से ही हो सकती है. दोनों अलग ध्रुव थे, गांधी आदर्शवादी थे तो वीर सावरकर यथार्थवादी. इसमे संदेह नहीं कि सावरकर की अपेक्षा गाँधी की स्वीकार्यता बहुत अधिक थी. लेकिन यहाँ ध्यान देने की बात है कि गाँधी का भारतीय राजनीति में आगमन सन 1920 के आसपास हुआ था जबकि सावरकर ने सन 1937 में हिंदू महासभा में का नेतृत्व लिया था (सन 1937 तक वीर सावरकर पर राजनीति में प्रवेश की पाबन्दी थी). जब गांधी भारतीय राजनीति में आये तो शिखर पर एक शून्य था, तिलक और गोखले जैसे लोग अपने अंतिम दिनों में थे. लेकिन जब वीर सावरकर आये तब गाँधी एक बड़े नेता बन चुके थे. भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में लोग महात्मा गाँधी को चमत्कारी पुरुष मानते थे और उनके नाम से कई किंवदंतियाँ प्रचलित थी, जैसे कि वे एकसाथ जेल में भी होते हैं और मुंबई में कांग्रेस की सभा में भी उपस्थित रहते हैं (पता नहीं इस तरह की कहानियों को प्रचलित करने में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का कितना योगदान है). ऐसे में सावरकर गाँधी के तिलिस्म को तोड़ नहीं सके, यद्यपि पढ़े लिखे लोगों के मध्य उनकी स्वीकार्यता अधिक थी. कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर प्रसिद्ध वकील निर्मलचन्द्र चटर्जी तक उनके अनुयायियों में थे (इन्ही निर्मल चंद्र चटर्जी के पुत्र हैं पूर्व लोकसभा अध्यक्ष- सोमनाथ चटर्जी). यदि सावरकर भी सन 1920 के आसपास ही राजनीति में आये होते तो जनमानस किसके साथ जाता, यह कोई नहीं जानता. वीर सावरकर उस दौर में एकमात्र राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने गाँधी से सीधे लोहा लिया था. कांग्रेस के अंदर और बाहर भी, ऐसे लोगों की लंबी सूचि है जो गाँधी से सहमत नहीं थे लेकिन कोई भी उनसे टक्कर नहीं ले सका. लेकिन सावरकर ने स्पष्ट शब्दों में अपनी असहमति दर्ज कराई. उन्होंने खिलाफत आंदोलन का पूरी शक्ति से विरोध किया और इसके घातक परिणामों की चेतावनी दी. इससे कौन इनकार करेगा कि खिलाफत आंदोलन से ही पाकिस्तान नाम के विषवृक्ष कि नीव पड़ी? इसी तरह सन 1946 के अंतरिम चुनावों के समय भी उन्होंने हिंदू समाज को चेतावनी दी कि कांग्रेस को वोट देने का अर्थ है ‘भारत का विभाजन’, वीर सावरकर सही साबित हुए. वीर सावरकर की सोच पूरी तरह वैज्ञानिक थी लेकिन तब भारत उनके वैज्ञानिक सोच के लिए तैयार नहीं था.
यह सच है कि सावरकर अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हुए. लेकिन सफलता ही एकमात्र पैमाना हो तो रानी लक्ष्मीबाई, सरदार भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे कई महान विभूतियों को इतिहास से निकाल देना चाहिए? स्वतंत्रता के बाद के दौर में भी देखें, तो राम मनोहर लोहिया और आचार्य कृपलानी जैसे लोगों का कोई महत्व नहीं? वैसे सफल कौन हुआ? जिसके लाश पर विभाजन होना था उसके आँखों के सामने ही देश बट गया. सफलता ही पूज्य है तो जिन्ना को ही क्यों न पूजें? उन्हें तो बस पाकिस्तान चाहिए था और ले कर दिखा दिया.  
भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगडी कहते थे कि व्यक्ति की महानता उसके जीवनकाल में प्राप्त सफलताओं से अथवा प्रसिद्धि से तय नहीं होती वरन भवीष्य पर उसके विचारों के प्रभाव से तय होती है. वीर सावरकर के विचार आज भी प्रासंगिक हैं और उनका प्रभाव कहाँ तक होगा, यह आनेवाला समय बताएगा. इतिहास सावरकर से न्याय करेगा अथवा नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इतिहास कौन लिखेगा.

Tuesday, April 12, 2011

भगवा आतंकवाद या कांग्रेसी साजिश


क्रिकेट वर्ल्डकप के रोमांच और अन्ना हजारे के अनशन के हंगामे में जिस एक खबर को महत्व नहीं दिया गया वो है स्वामी असीमानंद का नया बयान जिसमे उन्होंने सीबीआई पर दबाव डालकर बलपूर्वक पिछला बयान दिलवाने का आरोप लगाया था. स्वामी असीमानंद ने साफ़-साफ़ कहा है कि जिस कलीम से मिलकर उनके ह्रदय परिवर्तन की बात कही जा रही है उस कलीम से तो वे मिले भी नहीं और पूरा बयान सीबीआई अधिकारी टी आर बालाजी ने अपनी कल्पना के उड़ान भरते हुए तैयार किया है.
समग्रता में देखें तो मामला बेहद गंभीर साजिश का है. राहुल गाँधी का अमेरिकी राजदूत से यह कहना कि हिन्दू कट्टरपंथ, इस्लामी आतंकवाद से अधिक खतरनाक है, कांग्रेसी मानसिकता को उजागर करती है. दिग्विजय सिंह का आजमगढ़ में बाटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल उठाना, राहुल गाँधी का सिमी और संघ को एक बताना और ठीक इसके बाद इन्द्रेश कुमार पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहने का आरोप लगाना और असीमानंद का काल्पनिक बयान अपने विश्वस्त पत्रिका के जरिये लीक करना एक साजिश नहीं तो और क्या है?
जब तक जांच जारी है और न्यायालय से कोई निर्णय नहीं आ जाता तब तक यह कहना कि कुछ हिन्दू युवक आतंकवादी घटनाओं में शामिल थे अथवा नहीं थे, नादानी होगी. संभव है, जिस तरह से पिछले दशक में मंदिरों पर आतंकवादी हमले हुए और लगभग कोई कार्यवाई नहीं हुई अथवा जिस तरह से तमाम राजनीतिक दल मुस्लिम तुष्टिकरण में लगी हुई हैं, ऐसे में कुछ अधीर युवकों ने अतिरेक में आकार इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया हो. लेकिन इस आधार पर यह मान लेना तो हद दर्जे की मूर्खता होगी कि हिन्दू समाज का एक व्यवस्थित आतंकवादी नेटवर्क है जिसे भगवा आतंकवाद का नाम देना चाहिए. यह तो और भी अधिक मूर्खतापूर्ण और हास्यास्पद सोच होगी कि इन घटनाओं के पीछे संघ का हाथ है. लेकिन मूर्खतापूर्ण हरकतों के लिए प्रसिद्ध मनमोहननित भारत सरकार ऐसा न केवल सोच सकती है वरण प्रमाणित करने के लिए झूठी खबरे भी प्लांट करा सकती है.
यद्यपि किसी भी तरह के आतंकवाद को उचित नहीं ठहराया जा सकता और इसको नियंत्रित करना और दोषियों को दण्डित करना अत्यंत आवश्यक है. लेकिन आतंकवाद पर राजनीति करने वाले बेहद घृणित कम कर रहे हैं और इस पर बौद्धिक प्रदुषण फैला कर उसको संरक्षण देने का कम कर रहे हैं. यहाँ महाराष्ट्र एटीएस का यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण है कि कर्नल पुरोहित और स्वामी दयानंद (जो आतंकवादी घटनाओं के आरोपी हैं) संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत के हत्या की साजिश रच रहे थे. लेकिन कांग्रेस की केंद्र सरकार जांच को इस दिशा में ले हीं नहीं जाना चाहती है. यह तो बेहद भद्दा मजाक है कि जो संघ को हीं समाप्त करने की साजिश कर रहे थे उन्हें संघ से जोड़ दिया जाये. यानि चित भी मेरा, और पट भी. गृह सचिव जी. के. पिल्लई का यह बयान कि इस तरह के घटनाओं में अधिकतम 20  लोगों के शामिल होने की सम्भावना है और उनकी तलाश चल रही है, सब कुछ साफ़ कर देता है.
60 लाख स्वयंसेवक, सेवानिवृत सैन्य अधिकारीयों से लेकर वैज्ञानिकों तक से सुसज्जित, मानव संसाधन के दृष्टि से विश्व के सबसे बड़े संगठन को यदि आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देना हो तो परिदृश्य कितना भीषण होगा यह बताने के लिए मेरे पास कोई उदहारण नहीं है. संघ उनमे से नहीं जो तिलचट्टे मारने के लिए घर में आग लगा लेती है. यद्यपि संघ ने हिंदुओं की उर्जा को रचनात्मक कार्यों में लगाकर उनके किसी विध्वंशक कार्य में संलिप्तता की संभावनाओं को भी समाप्त हीं किया है. यह बात सरकार को अच्छी तरह पता है लेकिन उसे उस अजन्मे से अल्पसंख्यक समाज को डराना है जो न जन्मा है और न हीं जिसके जन्म लेने की कोई सम्भावना है. 
भ्रष्टाचार से लेकर महंगाई तक, काले धन से लेकर उद्योगपतियों की दलाली तक और सांसदों की खरीद से लेकर वोटर की खरीद तक कांग्रेस सरकार, प्रत्येक मामले में घिरी हुई है. उसे अच्छी तरह पता है कि यदि परिस्थितयां ऐसी हीं रही तो अगले आम चुनाव में कांग्रेस के सीटों की संख्या तीन अंको में भी नहीं पहुँच सकेगी. इसीलिए उसने भगवा आतंकवाद का कार्ड खेला है. इससे एक तो अल्पसंख्यक समुदाय का थोक वोट तय हो जायेगा दूसरे प्रबुद्ध हिन्दू समाज भी सरकार की सभी नाकामी भूल कर शांति और व्यवस्था के नाम पर उसे वोट देगा. कांग्रेस सत्ता के लिए कुछ भी कर सकती है यह प्रमाणित तथ्य है.
जब भारत सरकार हीं इस घृणित खेल में शामिल है तो चमचे क्यों पीछे रहें. एक बानगी देखिये. राष्ट्रीय सहारा (उर्दू दैनिक) के संपादक एजाज बर्नी ने एक पुस्तक लिखी है – ‘आरएसएस की साजिश -26/11’. देशद्रोह के सीमाओं को भी पार कर, इस पुस्तक में 26/11 के दुखद घटना के लिए संघ को जिम्मेवार बताया गया है. इस पुस्तक का विमोचन धर्मनिरपेक्षता के ध्वजवाहक दिग्विजय सिंह ने किया और कार्यक्रम में राज्यसभा के उपसभापति श्री के. रहमान खान भी उपस्थित थे.  राष्ट्र के संप्रभुता को झकझोर देने वाली इस घटना में सेना तथा पुलिस के कई अधिकारी शहीद हुए थे. पाकिस्तानी नागरिक कसाब जो इस साजिश का हिस्सा था, अभी जेल में बन्द है. अब यदि संघ ने इस घटना को अंजाम दिया है तो फिर कसाब कौन है और भारत सरकार पाकिस्तान में किसे सजा देने की मांग कर रही है? क्या यह देशद्रोह का मामला नहीं है? क्या राज्यसभा के उपसभापति के जिम्मेवार पड़ पर बैठे व्यक्ति को वहाँ होना चाहिए था? याद रखिये, 26/11 के बारे में पाकिस्तान में भी वही मत है जो बर्नी ने अपनी पुस्तक में लिखा है. ऐसे में क्या दिग्विजय सिंह पाकिस्तान के हीं मत को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं. क्या अब भी कोई संदेह रह जाता है कि वोट बैंक के लिए कांग्रेस ने देश की सुरक्षा और संप्रभुता को दाँव पर लगा दिया है?
ये सवाल सरकार से पूछे जाने चाहिए लेकिन कौन पूछेगा? मुख्यधारा की मीडिया तो ने तो अपने आँख, कान और दिमाग सब कुछ बन्द कर लिया है. एक राष्ट्रीय समाचार पत्र के मुख्यपृष्ठ पर  साध्वी प्रज्ञा के बारे में खबर छपी थी जिसमे लिखा था कि साध्वी प्रज्ञा आरएसएस की सदस्य हैं. अब इस पर हसें या सर पटकें यह आपका निर्णय. उल्लेखनीय है कि कोई महिला संघ की सदस्य नहीं हो सकती है और यह खुला तथ्य है. एक राष्ट्रीय समाचारपत्र के संपादक को यह ज्ञात नहीं हो यह मान लेना भी संभव नहीं. लेकिन यहाँ तो कांग्रेस के खाते में अधिक नंबर बटोरकर विज्ञापनों की संख्या बढ़ानी है, तथ्य की चिंता कौन करे. स्वामी असीमानंद के हीं तथाकथित स्वीकारोक्ति पर घंटे भर का विशेष शो करने वाले चैनल उनके ताजे बयान को बॉटम में हीं जगह  दिया है. तहलका के लिए जिस महिला पत्रकार ने स्वामी असीमानंद का तथाकथित बयान लीक किया, उसने एनडीटीवी के एक कार्यक्रम में भाजपा प्रवक्ता से सवाल किया कि जब साध्वी प्रज्ञा ने जांच अधिकारीयों द्वारा शारीरिक प्रतारणा की शिकायत कि तो आडवाणी जी ने संसद में यह सवाल क्यों उठाया. यानि साध्वी पर आतंकवाद के आरोप हैं  तो उनके मानवाधिकार के लिए भी बोलना अपराध बन जाता है.
कांग्रेस भगवा आतंकवाद के नाम पर आग से खेल रही है. उसे पता होना चाहिए कि सत्य सूर्य की भांति होता है उसे झूठ के कोहरे अधिक समय तक नहीं ढक सकते.

Tuesday, February 8, 2011

हिंदुत्व और भारतीयता

लगभग तीस भाषाओँ और तीन सौ बोलियों वाले भारतवर्ष के एकता का सूत्र क्या है? क्यों चावल को मुख्य भोजन मानने वाला बंगाल और रोटी खाने वाले पंजाब के साथ, एक सुर में  वन्दे मातरम गाता है. कुछ विरोधाभाषों के बाद भी आखिर तमिल और गुजरती के मध्य एकता के सूत्र क्या हैं? क्यों जब महाराष्ट्र में बिहारियों पर हमला हुआ तो विरोध में मराठी हीं उठ खड़े हुए ? वास्तव में इन तमाम विरोधाभाषों और भिन्नताओं के बीच, भारत के  एकता का सूत्र है क्या ? जितना भी सोचिये, जितना भी विचार कर लीजिये, घूम-फिर  कर उत्तर यही आएगा कि हिमाचल के पहाड़ों  में रहने वालों और केरल के समुद्रतट  पर रहने वाले लोगों के मध्य एक हीं सूत्र है जो उन्हें जोड़ता है, वो है हमारा धर्म हिंदुत्व . यह हिंदुत्व हीं है जो सभी विरोधाभाषों के बीच हमें जोड़ता है और हमें भारतीय बनाता है.  अर्थात यह हिंदुत्व हीं है जो भारत की आत्मा है. ऐसे में यह कहना कि हिंदुत्व शब्द भारतीयता का पर्यायवाची शब्द है, कतई भी अतिशयोक्ति नहीं है.
आज हमारे लिए राष्ट्रवाद की  वही परिभाषा है, जो योरोप ने अपने लिए तय किया था. लगभग सभी योरोपीय देशों में इसाई मत हीं बहुमत में है, फिर भी योरोप एक देश नहीं. इसका कारण भाषाई विभेद हीं हैं. खानपान और रहनसहन में कोई विशेष अंतर तो नहीं है. लेकिन भाषा, खानपान अथवा रहनसहन हमारे राष्ट्रवाद के मध्य कभी नहीं आया. हमारी तुलना  तुलना किसी अन्य देश अथवा भूभाग से नहीं कि जा सकती है क्योंकि हमारी सोच और संस्कृति  आयातित ना हो कर मौलिक है और दो मौलिक विचारधारा में अंतर होना स्वाभाविक हीं है.
आश्चर्य से भी अधिक तो यह दुखद बात है कि विश्वगुरु भारतवर्ष को राष्ट्रवाद के मानदंड वहां से लाना पड़ा,जहाँ सभ्यता के जन्म होने  से पहले हीं भारतवर्ष के राष्ट्र के रूप में परिणत ही चूका था. वास्तव में राष्ट्र के रूप में हमारी स्थिति अद्वितीय है. हमारे देश में राष्ट्र का आधार हीं धर्म है, धर्म क्या हिंदुत्व!  हिंदुत्व क्या जीवन के अंतिम लक्ष्य के प्रति एकरूपता. तो फिर यह स्वीकार करने में संकोच कैसा कि हिंदुत्व हीं भारतीयता है.
महर्षि अरविंद घोष ने कहा है ‘यह राष्ट्र धर्म के साथ पैदा हुआ, उसके साथ वह चलता है और उसी के साथ वह बढ़ता है. जब सनातन धर्म का क्षरण होता है तब राष्ट्र का क्षरण होता है’उदहारण के लिए ब्रह्मा देश (मयन्मार) से लेकर उपगणस्थान (अफगानिस्तान) और पाकिस्तान से लेकर बंगलादेश भी है जो कभी अखंड भारत की शोभा बढाता था. जो खंडित भारतवर्ष आज बचा है वो भी इसलिए कि इस भूमि पर सनातनधर्मियों  की बहुलता है. स्वामी विवेकानंद जी ने भी कहा था जो हिंदुत्व का  त्याग किया तो तुम्हारा (हिंदुओं का) अंत निश्चित है.
जब कांग्रेस के दुर्नीतियों के फलस्वरूप, 1947 में देश पर विभाजन का संकट आया और करोडो हिन्दुओं को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान(अब बंगलादेश) और पशिमी पाकिस्तान  से बलपूर्वक हटाया गया तो, उन्होंने भारतभूमि का रुख किया. आज भी पाकिस्तान अथवा बंगलादेश में हिन्दू पर अत्याचार होता है तो वे भारत का रुख करते हैं. प्रश्न है कि सिंध के प्रांतीय संसद के हिंदू सदस्य (और उनके जैसे हजारों पाकिस्तानी हिंदू) जो हाल हीं में जान से मारने की धमकी के बाद भारत में  शरण लेने आये हैं, वे भारत हीं क्यों आये ? क्यों नहीं इरान अथवा अफगानिस्तान चले गए? आज भी बंगलादेश और  में त्रस्त हिन्दू भारत का हीं रुख क्यों करते हैं, चीन अथवा मयन्मार का क्यों नहीं? आप सोचेंगे तो जवाब यही आएगा कि भारत में उन्हें हिन्दुओं के लिए एक स्वाभाविक शरण स्थली दिखती है. जब कि सच्चाई तो यह है कि हमारा देश घोषित तौर पर धर्मनिरपेक्ष है.
आज जो हमारा खंडित भारत बचा है उसमे भी अलगाववाद की आवाज उठ रही हैं. लेकिन आवाज भी सिर्फ वही उठती है जहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं. भले कई बार तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आन्दोलन हुए  हों. लेकिन कभी भारत को विभाजित करने जैसी भावना नहीं दिखी. भूलवश भी किसी हिन्दू बहुल राज्य के राजनीतिक संगठन ने भारत के अस्तित्व पर सवाल उठाने का साहस नहीं किया. लेकिन हिन्दुओं के अल्प संख्या वाले राज्यों में यह आम बात है.
जब वीर सावरकर ने कहा कि धर्मान्तरण हीं राष्ट्रान्तरण है तो उनका कांग्रेस के चमचो ने बड़ा विरोध किया. परन्तु जब हम कश्मीर से उत्तर-पूर्व तक धर्मान्तरण में राष्ट्रान्तरण का बिज देख रहे हैं तो भला इस सत्य को स्वीकार करने से इनकार कैसे करें.
इस भारतभूमि में, भारत का होना ना होना, हम हिन्दुओं के अतिरिक्त, किसी के लिए महत्व नहीं रखता. देश के बहुसंख्य मुसलमानों के लिए तो सम्पूर्ण भारतवर्ष को पाकिस्तान बनाना आज भी स्वप्न है. 1947 में विभाजन के पहले, हुआ आखिरी चुनाव पृथक निर्वाचन पद्धति के साथ हुआ था. यानि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मुसलमानों के लिए सीटें आरक्षित थी, जहाँ उम्मीदवार भी मुसलमान होते थे और मतदाता भी मुसलमान हीं हो सकते थे. कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने सभी मुस्लिम आरक्षित सीटों पर उम्मीदवार दिया था. कांग्रेस ने घोषित किया था कि यदि वे चुनाव जीत गए तो फिर देश नहीं बटेगा. वहीँ मुस्लिम लीग, अपने एक सूत्री मांग भारत विभाजन के साथ मुकाबले में उतरा था. जो चुनाव परिणाम आये, वे चौकानेवाले थे. कांग्रेस को मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटों पर भरी धक्का लगा था. जो सीटें कांग्रेस ने मुस्लिम कोटे की जीती भी थी, वे पख्तून क्षेत्र में थी अथवा सिंध में थी. लेकिन आज के भारत में अर्थात उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार सहित सम्पूर्ण भारत में मुस्लिम लीग का झंडा फहराया था. अर्थात वर्त्तमान भारत में रह रहे मुस्लिमों और उनके पूर्वजों ने पाकिस्तान को चुना था. मौलाना अबुल कलम आजाद ने भी अपनी पुस्तक में इस पर चर्चा कि है कि विभाजन में जब उत्तर प्रदेश, बंगाल और बिहार को पाकिस्तान में नहीं मिलाया जा सका तो मुसलमान हताश थे. वे आजाद से मिले तो आजाद ने उन्हें भारत में हीं रहने और भारत देश के साथ वफ़ादारी निभाने कि सलाह दी. कुछ इसी तरह की बात हाल हीं में कांग्रेसी सांसद रसीद अल्वी ने भी ‘दैनिक जागरण’ में लिखा था जो कि ‘पांचजन्य’ में भी प्रकाशित हुआ था.   
सुहरावर्दी ने तो सम्पूर्ण बंगाल को हीं पाकिस्तान बनाना चाहा था. उसने सोनार बांग्ला (स्वर्ण बंगाल) का नारा दिया, लेकिन श्यामा प्रसाद मुख़र्जी के प्रभाव के कारण वह असफल रहा. कहा जाता है कि तब सुहरावर्दी ने मुसलमानों से पश्चिम बंगाल में हीं रह कर ऐसी स्थिति बनाने की सलाह दी  कि जिससे एकदिन सम्पूर्ण बंगाल को भारतवर्ष से अलग किया जा सके. यही कहानी असम की भी है. यह अकाट्य तथ्य है कि खंडित भारत के मुसलमानों ने भी यदि अखंड भारत चाहा होता तो भारत का विभाजन नहीं होता. विभाजन का आधार हीं यही था कि लगभग ९५ प्रतिशत मुसलमानों ने अलग देश चाहा था. आज की तिथि में यदि आप मुसलमानों की राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता देखना चाहते हैं तोवन्दे मातरमजो कि राष्ट्रगीत है, के प्रति उनकी भावना को देखिये और समझिये.
मैं कई बार सोचता हूँ कि भला सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में भारत हीं एक मात्रा ऐसा देश क्यों है, जहाँ आप जितने ऊँचे सुर में चाहें, धर्मनिरपेक्षता का नारा लगा सकते हैं. क्यों हिन्दू यह सवाल नहीं करता कि विभाजन के बाद पाकिस्तान  में 11,000 मंदिर तोड़ दिए गए तो हम एक विवादित ढांचा (मस्जिद नहीं) को तोड़कर राष्ट्रपुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का मंदिर क्यों नहीं बना सकते? क्यों हिन्दू यह सवाल नहीं करता कि 1949 में जब पाकिस्तान में 18 प्रतिशत हिन्दू जनसँख्या थी और बंगलादेश में 35 प्रतिशत तो आज वे सब कहाँ विलुप्त हो गए? पाकिस्तान और बंगलादेश कि बात तो छोडिये, हिन्दू तो अपने हीं देश, कश्मीर में हीं हजारो मंदिरों के तोड़े जाने पर सवाल नहीं करते. वे तो यह भी नहीं पूछते कि जब 1950 में पश्चिम बंगाल में मुसलमान मात्र 10 प्रतिशत थे तो आज 30 प्रतिशत क्यों  और कैसे हो गए और यही हाल बिहार, उत्तर प्रदेश और असम का भी कैसे हो रहा है ? संभवतः मेरे प्रश्न का उत्तर भी हिंदुत्व में हीं है. हिंदुत्व में स्वयं हीं इतने आलोडन हैं कि इसे कट्टरता की सीमा में कभी बंधा हीं नहीं और ह्रदय के द्वार उदारता के सुगन्धित वायु के लिए खुले रखे गए.  वास्तव में हिंदुत्व religion नहीं है, यह धर्म है. religion हिंदी में संप्रदाय के समक्ष ठहरता है, वह धर्म का अंग्रेजी अनुवाद कभी नहीं हो सकता. इसी तरह इसाइयत अथवा इस्लाम धर्म नहीं हैं, ये संप्रदाय हैं. सम्प्रदायों में एक विशेष नियम होता है, उनसे अलग जाने की आज्ञा किसी को नहीं होती. सम्पूर्ण इस्लाम कुछेक सौ पन्नो के कुरान पर आधारित है, जैसे हीं कोई मुसलमान 2000 वर्ष पूर्व अरब देशों के कबीलाई सभ्यता के लिए लिखे गए कुरान से अलग आचरण  करता है, उसे इस्लाम  से बाहर कर दिया जाता है. कमोबेश यही हालात इसाई धर्म की भी है. दुसरे, सभी संप्रदाय में अपनी संख्या बढ़ने की होड़ लगी रहती है. मुसलमान इसके लिए जिहाद करते हैं तो इसाई अपने चर्च और मिशनरियों का सहारा लेते हैं.
लेकिन क्या किसी ने कभी सुना है कि धर्मविरुद्ध आचरण के दोषी पाए जाने पर हिन्दू धर्म से किसी का निष्काशन हुआ है? क्या ऐसी कोई पुस्तक हमारे धर्मगुरुओं ने परिभाषित की है जिसके विचारों को बिना सोचे समझे अमल में लाना हमारे लिए हिन्दू होने की पहली शर्त हो? अथवा तलवार के शक्ति से अथवा राजाश्रय का सहारा लेकर ऐसे लोगों के धर्मपरिवर्तन की कोशिश हुई हो जो पहले हिन्दू ना रहे हों ? उत्तर सिर्फ नहीं में हो सकता है.
अंततः हमें यह स्वीकार करना चाहिए हिंदुत्व और भारतीयता की स्थिति अन्य समकक्षों से अलग है, और दोनों का हीं सम्बन्ध अटूट है. इतना अटूट कि हिंदुत्व और भारतीयता एक दुसरे के पर्याय हैं.  अब चुकी हम हिन्दू हैं, अर्थात भारतीय हैं तो हिंदुत्व अर्थात भारतीयता की  रक्षा का और अखंड भारत के अखंड स्वप्न को पूर्ण करने का  कर्तब्य भी हमारी हीं है.