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Sunday, October 18, 2015

चुनाव मे बिहार


बिहार मे चुनाव का त्योहार है। अफवाहों और विश्लेषण का बाजार गर्म है। दिल्ली- एनसीआर मे पत्रकारिता करने वाले लोग पटना के टैक्सी ड्राईवरों से दो सवाल पूछकर पन्ने भर का लेख लिख रहे हैं। ऐसे मे जन्म से बिहारी होने के नाते हम भी दो आना का विश्लेषण तो करेंगे ही।
सवर्ण(भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ) इस चुनाव मे भाजपा की तरफ हैं जो बिहार की कुल आबादी का लगभग 14% हैं। इसके अतिरिक्त पासवान और वैश्य समाज भी भाजपानित गठबंधन को बड़ी संख्या मे वोट दे रहे जो बिहार की कुल जनसंख्या 11% हैं।
महागठबंधन की बात करें तो यादव, कुर्मी और मुसलमान उनके आधार वोट हैं जो बिहार की कुल आबादी का लगभग 30% हैं। इसतरह भाजपा का आधार वोट (सवर्ण, पासवान, वैश्य) जहां 25% है वहीं महागठबंधन का आधार वोट 30% का है। इसतरह आधार वोटों के मामले मे महागठबंधन को भाजपा से लगभग 5 अंको की बड़ी बढ़त हासिल है।
ऐसा नहीं कि सारे आधार वोट एक ही जगह गिरेंगे। उदाहरण के लिए, सारण क्षेत्र मे जहाँ प्रभुनाथ सिंह का प्रभाव है, राजपूत राजद को भी वोट देते दिखेंगे। कम-से-कम 3 सीटों पर भूमिहार जद(यू) को और इतनी ही सीटों पर ब्राह्मण कांग्रेस को वोट दे सकते हैं। सीमांचल मे कुछ सीटों पर लोजपा मुस्लिम वोट पा सकती है। भाजपा दर्जन भर सीटों पर यादवों का ठीक-ठाक वोट प्राप्त करेगी वहीं कुर्मी हम के वृषणी पटेल और शकुनि चौधरी के प्रभाव मे भी कुछ सीटों पर वोट करेंगे।
ऊपर के विश्लेषण मे हम देखते हैं कि बिहार के मतदाताओं का कुल 55% तो दोनों मुख्य गठबंधनों का आधार वोटर है। जबकि 45% वोटर की निष्ठा राज्यव्यापी स्तर पर इस समय किसी दल से नहीं है। इन 45% मतदाता मे से महादलित लगभग 10% है जिनमें रविदास, धोबी और मुसहर मुख्य कहे जा सकते हैं। मगध मे तो मुसहरों ने राजग के लिये वोट किया है लेकिन बाकी हिस्सों मे उनका वोटिंग पैटर्न क्या होगा यह अभी देखना बाकी है। धोबी मतदाता महागठबंधन के साथ ही जाएगा। जबकि रविदास दोनों तरफ वोट कर सकते हैं। ओबीसी से कुशवाहा (4%) हैं जो परंपरागत रूप से कुर्मियों के साथ वोट करते रहे हैं लेकिन इसबार आश्चर्यजनक रूप  से वे भाजपा के लिए भी वोट कर रहे हैं जिसमें उपेंद्र कुशवाहा का योगदान माना जा सकता है। उनका बराबर मत दोनों तरफ जाने की संभावना है। इबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) से निषाद (5%) हैं जो 2014 मे भाजपा के साथ थे। इसबार भी निषाद पूरी तरह भाजपा के पक्ष मे झुके दिखते हैं। इसके बाद आती है बारी इबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) मतदाताओं की जो 55 जातियों का समूह है जिनकी संख्या 28-30% है। बिहार मे इसबर राजनीतिक निर्णय इन्हीं इबीसी समूह के हाथ है। इन 55 जातियों मे निषादों का एक जातीय उप-समूह है(5%) जो 2014 के लोकसभा चुनाव मे भाजपा के साथ खड़ा था और इस बार भी भाजपा के साथ ही है। इसके बाद इनमें तेली बिरादरी(2%) है जो गुजरात के घांची जाति के समकक्ष है और पूर्णरूपेण भाजपा के साथ है। तेली और निषाद के बाद इबीसी मे कोई भी जाति 1% से अधिक नहीं है संख्याबल के मामले मे। इनकी कुल आबादी 21% से 23% है। इनमें आते हैं कानू, गोंड, कुम्हार, लोहार, माली, बढ़इ, नाई, पनवारी, नोनिया, कलवार इत्यादी। इनका जातियों का कोई राज्यव्यापी नेता नहीं होता हैं। ऐसा नहीं की ये इबीसी एक समूह के तौर पर वोट करती हैं। ऐसा भी नहीं कि इनमे से कोई एक जाति पूरे राज्य मे एक पैटर्न पर वोट करती है। इनमे से कुछ जातियाँ कस्बाई हैं और छोटे-मोटे व्यापार पर निर्भर हैं और कुछ जातियाँ ग्रामीण हैं। हर इलाके(3-4 ग्राम) मे इन जातियों का कुछ घर होता है। इनके वोटिंग पैटर्न का अंदाजा भी वोट के बाद ही लगता है नतीजों से। क्योंकि इनका इलाका होता नहीं इसलिए ये जातियाँ मुखर नहीं होती। 1995 के चुनाव तक इनमें लालू के पक्ष मे वोट देने का पैटर्न था। लेकिन उसके बाद इबीसी बिरादरी नितीश और भाजपा के साथ जुड़ी। कुर्मी अपेक्षाकृत शांत और कृषक बिरादरी है और संख्याबल मे भी कम है, जिसके साथ जाना इबीसी के कमजोर जातियों को दबंग यादवों के साथ जाने से बेहतर लगा। 2014 के लोकसभा चुनाव मे इबीसी का अच्छा खासा वोट भाजपा को मिला था लेकिन एक बड़ा हिस्सा नितीश के साथ भी गया था। 2015 के विधानसभा चुनाव मे यह देखना दिलचस्प होगा कि नितीश को 15 वर्षों से समर्थन दे रही इबीसी बिरादरी उनके साथ रहती है या अलग रास्ता देखती है। नितीश के शासन मे इबीसी लाभान्वित भी हुआ लेकिन वह लाभ उसे तब नहीं मिलेगा जब राजद की भी सरकार मे हिस्सेदारी हो। जबकि 2014 मे भाजपा को वोट देने वाले इबीसी वोटर महागठबंधन के पाले मे चले जायें इसकी संभावना थोड़ी कम है। भाजपा ने इबीसी उम्मीदवार बड़ी संख्या मे उतारे हैं।
दूसरे चरण के मतदान के पहले ही कहीं डॉ॰ प्रेम कुमार तो कहीं रामेश्वर चौरसिया को सीएम उम्मीदवार बता कर भी इन जातियों को साधने की कोशिश भाजपा द्वारा हो रही है। राजद और जद(यू) ने जितनी बड़ी संख्या मे यादव, कुर्मी और मुसलमान उम्मीदवार उतारे हैं उससे इबीसी बिरादरी कहीं न कहीं सशंकित है। बिहार मे मुस्लिम आबादी का स्वरूप कस्बाई अधिक है। भाजपा को इसी कारण कस्बों मे इबीसी वोट मिलता रहा है और वह इसबार भी मिलेगा।
विकास का भी मुद्दा है। गुंडागर्दी और कानून-व्यवस्था भी। 24 घंटे बिजली की हसरतें भी हैं।  आंचलिक मुद्दे भी हैं और महँगाई भी है। शराब की दुकानें जो नितीश राज मे हर गली मे खुली और शिक्षा की बदहाली और शिक्षा मित्रों की दुर्दशा भी मुद्दा है। गो-ह्त्या भी एक मुद्दा हो गया है जो सीमांचल मे बेहद संवेदनशील मुद्दा    है। हिन्दुत्व का भी मुद्दा है और भ्रष्टाचार का भी। लेकिन तय मानिए कि बिहार चुनाव का सारा खेल इन्हीं 21-23% मतदाताओं के वोट के लिए है। इन्हीं स्वतंत्र मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए दोनों पक्ष बड़े बड़े दावे कर रही हैं। सारी कयावद इन्हीं को अपने पाले करने के लिए है। इबीसी वोट जाएगा दोनों तरफ। लेकिन जिसको बड़ा हिस्सा जाएगा वो जीतेगा। और कौन ले रहा इनका अधिक वोट यह जानने का तरीका अब तक तो ईजाद हुआ नहीं है।
तो अगली बार बिहार चुनाव विश्लेषक से पूछिएगा कि कुम्हार और लोहार किसे वोट दे रहा और माली गोंड के साथ वोट करेगा या अलग और क्यों?

Monday, January 28, 2013

पद नहीं दायित्व है


अंततः भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव हो ही गया. एक बार पुनः समय का पहिया घूमकर वहीँ आ खड़ा हुआ है, जहाँ वह वर्ष 2009 में या इसके पहले भी हुआ करता था. हिंदी पट्टी के चार महत्वपूर्ण राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनाव, जो कि भाजपा के लिए करो और मरो के हैं तथा आसन्न लोकसभा चुनावों के लिए संगठन का नेतृत्व राजनाथ सिंह के हाथों में ही होगा.
जिस तरह से भाजपा अध्यक्ष का चुनाव हुआ है, वह अपने आप में कई यक्ष प्रश्न खड़ा करता है. कुछ घंटे पहले तक जिन नितिन गडकरी को दुबारा नेतृत्व मिलना तय माना जा रहा था, उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा. और जो राजनाथ सिंह कुछ घंटे पहले तक स्वयं को दौर से बाहर बता रहे थे, उन्हें तीन वर्ष के अंतर में ही फिर से वही जगह मिली.
किसने एनडीटीवी में गडकरी के खिलाफ ‘खुलासे’ करवाए, नितिन गडकरी के नियंत्रण वाली पूर्ती समूह में निवेश करने वाली कंपनियों से संबद्ध अन्य कंपनियों के पते में गडबडी को नितिन गडकरी के साथ जोड़ना मीडिया की मूर्खता थी या कोई षड़यंत्र, उनके नामांकन भरने से ठीक कुछ घंटे पहले आयकर विभाग की कार्यवाई क्या संयोग मात्र थी, इसपर दर्जनों अलग लाइनें हैं. जिस तरह से ये चीजें पिछले दिनों हुई हैं, उससे न केवल समर्थकों और  कार्यकर्ताओं में बल्कि शीर्ष नेतृत्व में भी बहुत हद तक अनिश्चय और अविश्वास की स्थिति बनी होगी. यह निश्चय ही भाजपा के लिए अच्छी बात तो नहीं है. गडकरी को जिस तरह का समर्थन दूसरे कार्यकाल के लिए मिला उसके पीछे कारण भी यही था कि दिल्ली की वह ‘माफिया’ जो भाजपा को स्वतंत्र नहीं होने देना चाहती, उसी ने गडकरी को रोकने के लिए एक-से-एक कहानियाँ प्रचारित करवाई. कोई व्यापार से सम्बन्ध रखने वाला गडकरी भाजपा संभाले तो वे भ्रष्टाचार के आरोप लगवा दें और कोई संजय जोशी जैसा प्रचारक संभाले तो उसकी नकली सीडी बनवा दें. इन लोगों ने निश्चय ही राजनाथ सिंह को नेतृत्व सौंपने के लिए ये कांटे नहीं बिछाए थे और उन्हें राजनाथ के आने से निराशा ही हासिल हुई है.
लेकिन जिस तरह कुछ घंटो में ही देश की मुख्य विपक्षी पार्टी नेतृत्व परिवर्तन के लिए तैयार हुई, वह आज के समय में जब ‘कॉर्पोरेट’ राजनीति को प्रभावित करने और राजनीति से प्रभावित होने वाली सबसे बड़ी शक्ति समझी जाती है, इस बात का संकेत है जनसंघ के तत्त्व अब भी बचे हुए हैं.
मिर्जापुर के एक छोटे से गाँव से निकलकर राजनाथ जहाँ पहुँचे हैं, वह अपने आप में सफलता की एक कहानी है. उनकी राजनीतिक यात्रा को देखें तो लगता है कि वे नए सम्बन्ध जोड़ने और पुराने को भी लेकर चलने में माहिर हैं. संघ से उनके सम्बन्ध बेहद अच्छे हैं. उनकी महत्वाकांक्षा कभी भी उस तरह से प्रगट नहीं होती है जिस तरह से मोदी और अरुण जेटली की. वे शत्रुता और बदले में विश्वास नहीं रखते. भाजपा जैसी पार्टी, जहाँ कभी यह सिद्धांत हुआ करता था कि पद उसे दो, जिसे नहीं चाहिए, यह एक लाभकारी गुण है. वे धोती पहनते हैं और ठेठ उत्तर भारतीय राजनेता लगते हैं, जो कि भाजपा की जरूरत भी है. वाजपेयी सरकार में कृषि मंत्री रहे हैं और किसान नेता कहे जा सकते हैं. चंद्रशेखर और भैरों सिंह शेखावत जैसे नेताओं के बाद के दौर में वे सबसे बड़े ठाकुर नेता भी हैं. चुनावों के समय हिंदी पट्टी में उनकी अच्छी मांग होती है. वे भाषणों में अनायास ही अटलजी की याद दिला देते हैं. भ्रष्टाचार के उनपर एक भी आरोप नहीं रहे हैं और जोड़-तोड़ के राजनीति में भी अच्छे खिलाडी माने जाते हैं. राजग के सहयोगियों और संभावित सहयोगियों से भी उनके सम्बन्ध अच्छे हैं.
उनकी चुनावी सफलता अबतक मिश्रित रही है. उनके उत्तरप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रहते ही पार्टी ने लोकसभा की 58 सीटें जीती थी. लेकिन उनके मुख्यमंत्री रहते हुए पार्टी विधयाकों की संख्या आधी हो गयी. उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए पार्टी ने गुजरात, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ को दोबारा जीता, उत्ताराखंड, हिमाचल में वापसी की, कर्णाटक में पहली सरकार बनाई तो जम्मूकश्मीर में भी अभूतपूर्व सफलता पाई. लेकिन 2009 के लोकसभा चुनावों में नतीजे खराब रहे. उनके गृह राज्य उत्तरप्रदेश में भी पार्टी की घोर दुर्दशा हो गयी. यदि सफलताएं राजनाथ के अकेले की नहीं हैं तो असफलताओं में भी हिस्सेदारी होगी हीं. तात्पर्य यह है कि चुनावी राजनीति में उनकी शक्ति का सही आकलन अब भी होना बाकी है.
राजनाथ सन 2005 में राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए नए थे. दिल्ली चौकड़ी, जिसने उस समय उनका जीना मुश्किल कर दिया था, अबतक बेहद कमजोर हो चुकी है. नरेन्द्र मोदी, जिन्हें पिछली बार राजनाथ ने संसदीय बोर्ड से हटाया था, अब अच्छे मित्र बताये जाते हैं. जबकि वसुंधरा राजे सिंधिया उन्हें नई पारी के लिए बधाई देनेवालों में सबसे आगे रहीं. राजनाथ स्वयं भी पहले से अधिक शक्तिशाली हो चुके हैं और संभव है परिपक्व भी. और सबसे बड़ी बात कि कांग्रेस बेहद खराब परिस्थितियों से गुजर रही है.
नरेन्द्र मोदी और राजनाथ की जोड़ी कारगर हो सकती है. यह अटल-आडवाणी जैसी जोड़ी तो नहीं है, लेकिन उपलब्ध विकल्पों में सबसे अच्छी है. मोदी शहरी मध्यवर्ग में खासा प्रभाव रखते हैं तो राजनाथ ग्रामीण अस्मिता के संवाहक हो सकते हैं. यदि मोदी चेहरा हुए तो राजनाथ संगठन साध सकते हैं. लेकिन प्रश्न वही है कि वाजपेयी और आडवाणी जी में जो आपसी विश्वास था वह आज किसी भाजपा नेता में किसी के लिए है भी या नहीं? सुविधा के सम्बन्ध तो ठीक लेकिन दिल कहाँ मिलते हैं? कौन किसकी टांग खिंच रहा है कोई जानता भी है या नहीं? भाजपा इससे अधिक नहीं बिखर सकती है, वह ‘जनता’ नामधारी होने के बाद भी जनता दल नहीं हो सकती क्योंकि उसके जीवन का स्त्रोत कहीं और ही बसता है. लेकिन संदेह के इस काल में जमघट को साधकर संगठन कौन बनाएगा? कौन संदेह से परे है? प्रचंड लक्ष्य है. राजनाथ ने ठीक ही कहा – पद नहीं दायित्व है. 

Sunday, June 24, 2012

नितीश कुमार का समाजवादी रंग- भाग एक


अब यह लगभग स्पष्ट है कि नितीश कुमार राजग का हिस्सा बने रहना नहीं चाहते हैं (मैं जनता दल यूनाइटेड इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि शरद यादव राजग से विलग होना नहीं चाहते). उन्हें यह ‘समझ’ में आ गया है कि भाजपा ‘सांप्रदायिक’ दल है और ‘लोहिया की धारा’ से निकले होने के कारण उन्हें भाजपा के साथ खड़ा नहीं होना चाहिए. यह अलग बात है कभी लोहिया भी जनसंघ के साथ खड़े हुए थे और नितीश भी भाजपा के साथ तब आये थे जब रामजन्मभूमि आंदोलन चरम पर था. आज नितीश कुमार देश के संभवतः दूसरे सर्वाधिक चर्चित मुख्यमंत्री हैं. लालू प्रसाद यादव के जंगल राज से निकालकर, बिहार को विकास के रास्ते पर लाने वाले नितीश कुमार के ‘राजनीतिक विकास’ को समझने का प्रयास किया गया है.
सन 1990 में लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री बनने के पहले तक नितीश कुमार की पहचान लालू यादव के एक विश्वसनीय सिपाही और सलाहकार के रूप में ही थी. वे पहली बार सन 1985 में बिहार विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए. सन 1989 में उन्हें पहली बार लोकसभा जाने का मौका मिला और लालू के समर्थन से हीं राज्य स्तर के मंत्री भी बनाये गए. जब शरद यादव, चौधरी देवीलाल से लालू को मुख्यमंत्री बनाने की पैरवी कर रहे थे तो नितीश भी अपने स्तर लालू यादव के लिए समर्थन जुटाने में लगे थे. कहने वाले कहते हैं कि रघुनाथ झा को तीसरे उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारने का सुझाव लालू यादव को नितीश कुमार ने ही दिया था. और इसी ‘ब्रह्मास्त्र’ के सहारे लालू यादव, रामसुंदर दास से अधिक विधायक जुटाने में सफल रहे.
लेकिन सामूहिक नेतृत्व में मिली सत्ता को लालू ने एक झटके में अपनी सत्ता बना ली. मंडल कमीशन के दौर में ‘भूरा बाल’ साफ़ करने के नारे से लेकर लालकृष्ण आडवानी के रथयात्रा को रोककर कर वे एक झटके में ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यक समाज के एकक्षत्र नेता बन गए. इस पूरे दौर में नितीश कुमार छाया के तरह उनके साथ लगे रहे. अब लालू दिन में हीं प्रधानमंत्री बनने के सपने देखने लगे थे. नितीश कुमार भी चाहते थे कि ‘बड़े भाई’ दिल्ली प्रस्थान करें तो बिहार उन्हें दे जाये. लेकिन लालू पटना से हीं दिल्ली साध रहे थे. ऐसे में नितीश को अलग होना ही था. सन 1994 में बिहार 40 जातीय सम्मलेन हुए. इन सभी सम्मेलनों में नितीश ही संयोजक हुआ करते थे. आखिरी रैली कुर्मी जाती की थी जिससे नितीश कुमार भी आते हैं. मंच से ही नितीश ने लालू यादव से कुर्मियों के लिए आरक्षण माँगा. लालू ने नहीं दिया और ‘कुर्मी जाति के साथ हुए अन्याय’ के विरोध में नितीश कुमार ने पार्टी छोड़ दी. इसके पहले तक नितीश कुमार को कुर्मी पूछते तक नहीं थे.
समाजवादी राजनीतिक धारा के ‘उच्च’ परम्पराओं के अनुसार जार्ज फर्नांडिस भी नाराज ही चल रहे थे तो दोनों ने एकसाथ आकार समता पार्टी बना ली. सन 1995 के विधानसभा चुनाव में समता पार्टी अकेले लड़ी. तब भी नितीश कुमार मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे. लेकिन अविभाजित बिहार में कुल जमा 6 सीटें हीं जित सके. इसी विधानसभा चुनाव में भाजपा कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभर के आई और यशवंत सिन्हा के बाद सुशील कुमार मोदी बिहार में विपक्ष के नेता बने. ‘बाबरी ढांचा विध्वंश’ से लेकर जनता दल-कांग्रेस की यारी ने सवर्णों को भाजपा के पाले में लाकर खड़ा का दिया. शहरी मध्यवर्ग एवं व्यवसायी वर्ग तो पारंपरिक रूप से भाजपा के साथ रहा ही है.
लेकिन भाजपा को एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो पिछडों को लालू यादव से तोड़ सके और साथ ही उसके अपने वोटर के लिए भी खतरा न हो. प्रारंभिक दिनों में घोर जातिवादी रहे नितीश कुमार के कम बोलने की विशेषता उन्हें इस योग्य बनाती थी. नाम न था लेकिन बदनाम भी नहीं थे. साथ ही सभी समाजवादी धडों में जार्ज फर्नांडिस का भी अपना सम्मान था. उनके साथ आने से गठबंधन के लिए अन्य दलों में स्वीकृति की संभावना भी बढती थी. ऐसे समय में नितीश कुमार को भाजपा का साथ मिला और संगठन से लेकर अन्य ‘भौतिक संसाधनों’ की जरूरतें भाजपा ने ही पूरी की. उन्हें लागातार केन्द्र सरकार में रेलवे और कृषि जैसे महत्वपूर्ण विभाग दिए गए. जबकि रामविलास पासवान ने केंद्रीय मंत्रालयों के जरिए स्वयं को स्थापित करने की कोशिश की तो उन्हें एक तरह से बाहर भी किया गया. सन 2000 के विधानसभा चुनाव के बाद जनता दल यूनाइटेड के अपेक्षा दोगुनी सीट जित कर भी भाजपा ने नितीश को ही नेतृत्व दिया. जबकि सन 2005 के बाद वे स्वाभाविक दावेदार  के तौर पर उभर के सामने आये.
अब तक का गठबंधन, जार्ज फर्नांडीस और भाजपा का था. लेकिन यहाँ से यह नितीश कुमार और भाजपा का होना था. ‘उच्च’ समाजवादी परम्पराओं के अनुसार फर्नांडीस को हटाकर शरद यादव को अध्यक्ष बनाया गया. एक-एक कर जार्ज के समर्थकों को ठिकाने लगाया गया. इसके बाद अपने ही उन साथियों को निपटाया जो मुश्किल दिनों में हमेशा उनके साथ खड़े रहे. आज राजीव रंजन सिंह, अरुण कुमार, प्रभुनाथ सिंह, दिग्विजय सिंह (अब दिवंगत), ओम प्रकाश यादव, उपेन्द्र कुश्वाहा जैसे कितने ही लोग अलग खड़े दिख रहे हैं. जबकि लालू के जंगल राज के सिपाही श्याम रजक, शिवानंद तिवारी, रमई राम, संजय सिंह जैसे और कितने ही नितीश कुमार के इर्द-गिर्द दीखते हैं. सामूहिक सरकार को ‘विधिपूर्वक’ नितीश की सरकार बनाई गई.
सत्ता का नशा ही कुछ ऐसा होता है कि संघर्ष के दिनों के साथी बोझ लगते हैं और कल तक गाली देने वाले चारण-भाट प्रिय लगने लगते हैं. यह नजारा गुजरात से बिहार तक देखा जा सकता है और किसी भी दौर में देखा जा सकता है.
इसमे कोई संदेह नहीं कि भाजपा का साथ न मिला होता तो नितीश कुमार की राजनीति शुरू होने के साथ ही खत्म हों गई होती. उस दौर में भाजपा से अधिक अछूत तो नितीश ही थे. धीरे-धीरे लालू यादव से नाराज लोग नितीश के साथ आते गए और कुनबा बढ़ता गया. लालू यादव ने स्वयं को ओबीसी+दलित+मुस्लिम नेता से मुस्लिम+यादव में बदल लिया. उन्हें इस बात का गुमान था कि जब मुस्लिम+यादव वोट 30 प्रतिशत होते हैं तो किसी और की क्या आवश्यकता. लेकिन समय का चक्र ऐसा घूमा कि यादव और मुस्लिम वोट बैंक ही आमने – सामने खड़े हो गए.
कभी बड़ी, फिर बराबर के साथी रही भाजपा को नितीश कुमार जूनियर समझते, समझाते और बनाते रहे. नितीश का इतिहास बताता है कि वे भाजपा के साथ अब नहीं चलेंगे. जब तीन दशकों तक साथ रहे लोग नेपथ्य में ठेल  दिए गए तो भाजपा तो फिर भी अलग दल है. शरद यादव को इस्तेमाल कर उन्होंने जार्ज फर्नांडीस को निपटाया था और अब शरद यादव को ही निपटाने पर लगे हैं. इसके सपष्ट संकेत तब मिले जब शिवानंद तिवारी भी शरद यादव के साथ राजग के बैठक में शामिल हुए. शरद यादव की झुंझलाहट भी कभी-कभी दिख ही जाती है. भाजपा और जनता दल यूनाइटेड के मध्य अब शरद यादव ही एक डोर हैं या यूँ कहे कि नितीश के भाजपा से अलग होने के राह में बाधा भी हैं.

(अगले भाग में हम राजग के टूटने के बाद की परिस्थितयों पर चर्चा करेंगे).
 

Friday, March 9, 2012

भाजपा के लिए उत्तरप्रदेश का सबक


राष्ट्रीय राजनीति के लिए सबसे महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव उत्तरप्रदेश का ही होता है, इसमे संभवतः किसी को कोई संदेह नहीं होगा. और यह चुनाव भाजपा के लिए किसी झटके से कम नहीं रहे. यहाँ यह समझना आवश्यक है कि भाजपा जब देश में कही नहीं थी तब भी उत्तरप्रदेश में थी. आज जबकि भाजपा 8 राज्यों में सीधा शासन कर रही और 2 राज्यों में सत्ता में हिस्सेदार है तो उत्तरप्रदेश में मुकाबले तक में नहीं है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि 1990-2000 के दौर में यूपी के राजनीति के केंद्र में रही पार्टी आज मुख्य मुकाबले से ही बाहर है? राजस्थान से पंडित दीनदयाल उपाध्याय, महाराष्ट्र से नानाजी देशमुख और मध्यप्रदेश से आकर अटलबिहारी वाजपेयी ने उत्तरप्रदेश में जनसंघ को खड़ा किया. स्वयं देवरस जी ने भी उत्तरप्रदेश में संगठन बनाने का काम किया था. साथ में संघ के सैकड़ों सक्षम कार्यकर्ताओं की सेना भी थी. लेकिन एक-पर-एक आत्मघाती कदम उठाकर भाजपा नेतृत्व ने अपनी ही कमर तोड़ दी. इस दौर में उत्तरप्रदेश की नब्ज को समझने वाला ऐसा कोई रहा भी नहीं जैसे देवरस जी, रज्जू भैया समझते थे. गोविंदाचार्य हैं लेकिन उन्हें रहने नहीं दिया गया है. उत्तरप्रदेश में एक चुनाव में हार के कारणों की विवेचना से अधिक महत्वपूर्ण है कि भाजपा अपने उत्तरोत्तर पतन के कारणों को ढूंढे. यहाँ कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण कारणों की विवेचना की गई है.
1.       जातीय गोलबंदी में दरार: उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा के दुर्गति के दीर्घकालिक कारणों को समझने के लिए हमें 22 साल पीछे वर्ष 1989 में जाना पड़ेगा. वर्ष 1989 में भाजपा ने उत्तरप्रदेश में 50 सीटें जीती थी. लेकिन राम मंदिर आंदोलन के लहर पर चढकर यही पार्टी मात्र दो साल बाद 1991 में 215 सीटें जीत गई थी. इस जीत का सबसे बड़ा कारण राम मंदिर आंदोलन तो था ही लेकिन यह समझना होगा कि उस समय ब्राह्मण, वैश्य, दलित और गैर यादव ओबीसी का अद्वितीय गठजोड़ भी था. साथ अन्य जातियों की भी हिस्सेदारी थी. लेकिन अयोध्या के विवादित ढांचे के विध्वंश के ठीक बाद हुए चुनाव में जब भाजपा 175 सीटों के आसपास निपट गई तभी साफ़ हो गया था सोशल इंजीनियरिंग दरकने लगा है. 1999 का लोकसभा चुनाव जिसमे भाजपा मात्र 28 सीटों पर निपट गई थी, इस बात का प्रमाण थी की पार्टी को गहन सर्जरी की आवश्यकता है. सर्जरी हुआ भी, कल्याण सिंह को मुख्यमत्री पद से हटा दिया गया और नेतृत्व वाया रामप्रकाश गुप्ता, ‘ठाकुर’ राजनाथ सिंह के पास पहुँच गई. राजनीति के मजे हुए खिलाडियों को भला यह क्यों समझ नहीं आया कि कल्याण सिंह ओबीसी वोटों के लिए चुम्बक का काम करते थे. ब्राह्मण वोट तो तब पार्टी के राष्ट्रीय चेहरे वाजपेयी जी को देख कर मिलते ही थे. लेकिन उसी दौर में उत्तरप्रदेश के सोशल इंजीनियरिंग के मुख्य इंजीनियर के. एन. गोविंदाचार्य पार्टी में किनारे कर दिए गए और फिर उन्होंने राजनीति ही छोड़ दी. स्पष्ट है कि पार्टी में किसी को भी यूपी जैसा गढ़ बचा कर रखना जरूरी नहीं लगा और राज्य इकाई को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया. ऐसे में जातीय गोलबंदी को तो दरकना ही था.
2.       राम मंदिर मुद्दे का समाधान नहीं करना: एक दूसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण कारण है भाजपा का राम मंदिर के मुद्दे का समाधान नहीं करना. केंद्र में राजग सरकार के गठन के बाद ही पुरे देश में राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों की उम्मीदें बढ़ गई थी. ऐसा लगता था कि भाजपा शीघ्र ही राम मंदिर के निर्माण के लिए क़ानून बनाएगी या एक तरह का राजनीतिक समाधान ही निकालेगी. लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के नतृत्व वाली सरकार इस मुद्दे पर गंभीर नहीं दिख रही थी. यह ठीक है कि तत्कालीन राजग गठजोड़ में शामिल कुछ महत्वपूर्ण दल इस मुद्दे पर भाजपा के स्टैंड से सहमत नहीं थे और इस दिशा में कोई कदम सरकार के पतन का कारण बनती. लेकिन यह तर्क उन लोगों के गले कैसे उतरता जिन्होंने इस आंदोलन में अपने जान कि बाजी भी लगा थी. स्पष्ट है कि इससे पुरे देश और विशेष रूप से उत्तरप्रदेश में यही सन्देश गया कि भाजपा ने मंदिर मुद्दे को राजनीति के लिए उपयोग में लाया और ‘राम’ के  नाम पर जुटे वोटर वापस जातियों के खांचे में लौट गए. राम मंदिर मुद्दे का सबसे बड़ा लाभ भाजपा को उत्तरप्रदेश में मिला था तो सबसे बड़ी हानि भी वहीँ हुई.
3.       क्षेत्रीय दलों से मित्रता: भाजपा की दुर्गति का एक महत्वपूर्ण कारण उत्तरप्रदेश के क्षेत्रीय दलों से हाथ मिलाना भी था. 2002 के विधानसभा चुनावों में पराजय के बाद भाजपा ने बसपा को सरकार बनाने में सहयोग देकर भाजपा ने निर्णायक बूल की. नीति यह थी कि मायावती से इसके बदले में लोकसभा चुनावों में 50-55 सीट लेकर पार्टी को फिर से खड़ा किया जाये लेकिन मायावती हाथ नहीं आई और मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया. अब सरकार बनाने की बारी ‘मौलाना’ मुलायम की थी. बहुमत के लिए आंकड़े कम हो रहे थे तो अमर सिंह की प्रतिभा का उपयोग करते हुए बसपा के एक तिहाई विधायकों को तोड़ लिया गया. लेकिन तबतक ‘प्रभावी’ हो चुकी नये दल-बदल कानून के तहत यह टूट अवैधानिक थी और बसपा छोड़ने वाले विधायकों को सदन से निलंबित कर देना चाहिए था. तब विधानसभा अध्यक्ष भाजपा के हीं वरिष्ठ नेता श्री केसरीनाथ त्रिपाठी थे जिन्होंने यह अत्यंत आवश्यक वैधानिक कदम नहीं उठाया. सपा के सरकार में भी वे विधानसभा के अध्यक्ष बने रहे और सपा ने उन्हें बनाये रखा भी. इससे उत्तरप्रदेश की जनता में यह सन्देश गया कि भाजपा का मौन समर्थन ‘मौलाना’ मुलायम को प्राप्त है. वास्तव में 2003 आते-आते पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को यह समझ आने लगा था कि भाजपा उत्तर प्रदेश में अब सबसे बड़ी शक्ति नहीं रही. वातानुकूलित कार्यालयों में बैठकर राजनीति करने की ऐसी लत लग चुकी थी कि सड़क पर संघर्ष कर जनता में साख बनाने से अच्छा समाधान उन्हें यही प्रतीत हुआ कि बसपा या सपा से गठजोड ही क्यों न कर लिया जाए. ऐसे में पार्टी पहले बसपा और फिर सपा के लिए ‘सॉफ्ट’ होती गई. यह सोच ही उत्तरप्रदेश में भाजप के लिए “आखिरी कील’ प्रमाणित हुई. 2004 के लोकसभा चुनावों के ठीक पहले भाजपा नेतृत्व के दिए गए व्यक्तव्यों को याद करिये. वाजपेयी जी ने मुलायम सिंह को राजग में शामिल होने का न्योता दिया. तत्कालीन राजग संयोजक जार्ज फर्नांडीस को इस काम में लगाया भी गया लेकिन बात नहीं बनी. उत्तरप्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान स्वयं प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘भाजपा को वोट दीजिए, नहीं दे सकते तो सपा को दीजिए’. आडवाणी ‘भारत उदय’ रथ यात्रा के दौरान लोगों को बता रहे थे कि लोहिया और पंडित दीनदयाल जी में अच्छी जमती थी और दोनों के विचारों में साम्यता थी, बात ठीक भी है. लेकिन इस समयकाल में लोहिया के उत्तराधिकारी मुलायम थे और पंडित दीनदयालजी के वाजपेयी-आडवाणी. ऐसे में जो सन्देश जाना था वह चला गया. संघ परिवार के अंदर भी यह सवाल उठा कि जब भाजपा और सपा की विचारधारा एक ही है तो फिर इसमे संघ परिवार की भूमिका क्या हो. कार्यकर्ताओं को जमीनी स्तर पर इस प्रश्न का उत्तर नहीं सूझ रहा था कि जब भाजपा और सपा, दोनों की विचारधारा एक ही है तो उन रामभक्तों का क्या जो मुलायम सरकार की गोलियों के शिकार हुए. परिणाम हुआ कि संघ के कार्यकर्ता घर बैठ गए और एक मजबूत और विश्वसनीय संगठन का सहयोग क्रमशः घटने लगा. संघ परिवार से इतर भाजपा का उत्तरप्रदेश में न तब संगठन था न अब है.
4.       जनसंघर्ष से दूरी: भाजपा उत्तर प्रदेश में वर्ष 2002 से सत्ता से बाहर है लेकिन याद नहीं आता कि पार्टी ने जनहित के मुद्दों पर जनता के बीच जाकर सड़क पर कोई राज्यव्यापी संघर्ष किया हो. मात्र औपचारिकता के लिए जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन अलग बात है. लेकिन सत्ता से विछुब्ध लोगों की सहानुभूति को अर्जित करने का तरीका जनसंघर्ष ही होता है. सपा के शासनकाल में यह ‘जनसंघर्ष’ बसपा ने किया और बसपा के शासनकाल में सपा ने किया. ऐसे में उत्तरप्रदेश की राजनीति इन दो दलों के मध्य ही सिमट जाना था और ऐसा ही हुआ भी.
5.       नये नेतृत्व का अभाव: यद्यपि भाजपा में सामूहिक नेतृत्व की परंपरा है लेकिन जनता के बीच एक सर्वमान्य चेहरे की आवश्यकता तो होती ही है. उत्तरप्रदेश में भाजपा के जीतने महत्वपूर्ण चेहरे हैं सभी राम मंदिर आंदोलन की ही उपज हैं. अयोध्या से इतर इनकी अपनी कोई साख है नहीं और जब अयोध्या का मुद्दा आज भी अधर में है तो इस साख पर इन्हें वोट अब मिलते नहीं. ऐसे में विकास, सुशासन और क़ानून व्यवस्था के मामले में अच्छा रिकार्ड होनेके बाद भी उन मुद्दों पर इनको वोट मिलते नहीं. ऐसे में राज्य स्तर पर नया नेतृत्व न उभर पाना भी एक बड़ा संकट है.
इलाज के लिया बिमारी को जान लेना आवश्यक है. उत्तरप्रदेश में भाजपा का पुनरुत्थान असंभव नहीं है. सौभाग्य से संघ परिवार का संगठन आज भी मजबूत है. उमा भारती के रूप में नया नेतृत्व पार्टी को मिला है जिनकी छवि ‘फुस्स बम’ की नहीं है. उमा कि एक बड़ी विशेषता यह है कि वे पिछड़े वोटबैंक को तो जोड़ हीं सकती हैं साथ ही सवर्णों में भी वे लोकप्रिय हैं. 15 प्रतिशत वोट भाजपा को इस विधानसभा चुनाव में मिले हैं, मतलब पार्टी खत्म नहीं हुई है. शहरी क्षेत्रों में भाजपा को ठीक-ठाक वोट मिले हैं यानी जनसंघ के दौर का वोटर अब भी साथ है.
चुनाव जीतने के साथ ही सपा की गुंडई उत्तरप्रदेश में दिखने लगी है. अखिलेश यादव चाहे जीतना दावा करें, सपाई गुंडई तो करेंगे ही. यदि अखिलेश अपने वादों को पूरा न कर सके तो उनकी हालत भी लोकसभा चुनाव आते-आते राहुल गाँधी जैसी ही हो जायेगी. वैसे भी इतने बड़े प्रदेश में किसी के लिए भी लोकप्रियता के ग्राफ को बनाये रखना बहुत बड़ी चुनौती है. बसपा के लिए यहाँ से आगे की राह बड़ी मुश्किल है. मुलायम के पास तो अखिलेश थे छवि बदलने के लिए, माया के पास कौन है? हो भी तो भला माया उसे मौका देंगी? कत्तई नहीं. लोकतंत्र में विपक्ष के लिए जगह हमेशा ही खाली होती है, विशेषकर उत्तरप्रदेश जैसे विविधतापूर्ण राज्य में. राहुल गांधी की साख खत्म हो चुकी है और माया की छवि महारानी की हो गई है. आसन्न लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस मुस्लिम वोट को पाने के लिए दांव बढ़ा सकती है. और इस वोट को बचाने के लिए मुलायम भी दांव बढ़ाने को मजबूर होंगे. मुलायम की समस्या यह है कि ओबीसी और मुस्लिम वोट बैंक आमने-सामने खड़े होने की दिशा में बढ़ रहे हैं. दोनों को एक साथ साध पाना आसान नहीं होगा. ऐसे में भाजपा के पास हिंदुत्व को नई धार देना संभव होगा. वैसे भी सपा का शासनकाल भाजपा के लिए हिंदुत्ववादी शक्तियों को एक करने का मौका है. उम्मीद की किरण है, मौका है, संघर्ष की इच्छाशक्ति हो तो बात बन सकती है.