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Saturday, August 24, 2013

मौलाना के राज में

जजिया कर दे कर ही सही किन्तु तीर्थयात्रा पर तो हिंदु औरंगजेब के शासनकाल में भी जाते ही थे. भारत के ज्ञात इतिहास में संभवतः ऐसा कोई अवसर न आया होगा जब हिन्दू संतों को धर्मनगरी अयोध्या के परिक्रमा से भी रोका गया हो. चौरासी कोस परिक्रमा की परंपरा युगों से चली आ रही है. हिन्दू धर्म में इसका एक विशेष महत्व है. साधू-संत जिन रास्तों से होकर परिक्रमा करना चाहते हैं वही परिक्रमा का पारंपरिक रास्ता है. जिन चालीस पड़ावों पर परिक्रमा करते हुए संत रुकेंगे, वे सभी युगों से चले आ रहे परंपरा में निश्चित पड़ाव हैं. रही बात परिक्रमा के समय के शास्त्रोचित होने का तो यह तो अपने आप में हास्यास्पद है और सपा सरकार का सूरज को दिया दिखने जैसा दुस्साहस है. आखिर सरकार किस अधिकार से विभिन्न धर्मपीठों के महंतों और शंकराचार्यों से यह प्रश्न कर रही है कि परिक्रमा के लिए यह समय शास्त्रोचित है अथवा नही? शास्त्रोचित होने का निर्णय धर्माचार्य करेंगे या सरकार करेगी? और यदि शास्त्रोचित नहीं भी हो तो सरकार को इसमें भला क्यों हस्तक्षेप करना चाहिए?
17 अगस्त को विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ मार्गदर्शक श्री अशोक सिंघल के नेतृत्व में संतों का एक प्रतिनिधि मंडल उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तथा उनके पिता और प्रदेश के ‘महामुख्यमंत्री’ मुलायम सिंह यादव से मिला. अन्य बातों के अतिरिक्त प्रतिनिधि मंडल ने पूर्व घोषित चौरासी कोस परिक्रमा की औपचारिक जानकारी सरकार को दी और उचित प्रशासनिक प्रबंध का अनुरोध किया. जैसा की श्री अशोक सिंघल ने बताया है कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके पिता का इस मुद्दे पर रुख सकारात्मक था और उन्होंने उचित प्रशासनिक व्यवस्था का आश्वासन भी दिया था. लेकिन ‘यू टर्न’ के लिए जगत कुख्यात ‘नेताजी’ शीघ्र ही पलट गए. उचित प्रशासनिक प्रबंध को कौन कहे उन्होंने तो परिक्रमा पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया.
परिक्रमा पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए उत्तरप्रदेश की सरकार ने जो आधार बताया वह स्वयं में घोर आपत्तिजनक और संतों का अपमान करने वाला है. 20 दिन की इस यात्रा में देश के 40 में से 36 प्रान्तों के संत हिस्सा लेंगे. एक प्रान्त के संत मात्र एक दिन यात्रा करेंगे. इस प्रकार अधिकाधिक 200 संत प्रत्येक दिन पदयात्रा में हिस्सा लेंगे. सरकार का यह कहना कि संतों के यात्रा से कानून-व्यवस्था का संकट खड़ा होगा, अपने आप में हैरान कर देने वाला है. क्या हिन्दू संत हिंसक प्रवृति के हैं? क्या इन संतों का कोई आपराधिक रिकार्ड है? क्या प्रयाग में हुए कुम्भ में संतों ने कोई भडकाऊ भाषण दिए थे? क्या वहाँ उन्होंने किसी प्रकार से शासन व्यवस्था के लिए कोई समस्या खड़ी की थी? आखिर यह मान लेने का आधार क्या है कि चौरासी कोस परिक्रमा से कानून-व्यवस्था का संकट खड़ा होगा? और कानून-व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर देश में हिंदुओं के मौलिक अधिकार को कैसे छिना जा सकता है? होने को तो उत्तरप्रदेश में प्रत्येक माह कोई दंगा होता है. ये दंगे किन धार्मिक परिक्रमाओं का परिणाम हैं? दंगे तो इस देश में प्रत्येक मुहर्रम पर हुए हैं. लेकिन ताजिया निकलने की परंपरा तो निर्बाध जारी है. निस्संदेह कानून-व्यवस्था बनाये रखना राज्य सरकार का कर्तव्य है (जिसके पालन में समजवादी पार्टी की सरकार अबतक पूर्णतया विफल रही है). लेकिन इस नाम पर वह हिंदुओं के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकती.
देश के शक्तिशाली ‘सेकुलर’ बुद्धिजीवी वर्ग का परिक्रमा के विरोध में इस आधार पर वातावरण खड़ा करना कि इसपर राजनीति होगी, कम हास्यास्पद नहीं है. इस देश में तो राजनीति फिल्मों पर होती है, पुस्तकों पर होती है, नाटकों के मंचन पर होती है, समाचारपत्रों में छपे लेख पर भी होती है. पड़ोसी देश बांग्लादेश में किसी दुर्दांत अपराधी को मृत्युदंड मिलने पर भी होती है और डेनमार्क के किसी विवादित और अनदेखे कार्टून पर भी होती है. अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका टाइम्स के कवर स्टोरी पर भी होती है और सलमान रुश्दी जैसे लेखकों पर भी होती है. चीन के घुसपैठ पर होती है तो पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय सैनिकों के हत्या पर होती है. बाढ़ पर भी होती है और सूखे पर भी होती है. और तो और बर्मा के आतंरिक झगडों पर भी होती है. तो प्रश्न है कि राजनीति से बचने के लिए आखिर किन-किन चीजों पर प्रतिबन्ध लगेगा? और एक लोकतान्त्रिक देश में राजनीति नहीं होगी तो क्या होगा? ऐसी हर एक बात जिससे जनमत प्रभावित होगा उसपर राजनीति होगी ही. यद्यपि गन्दी राजनीति से बचना चाहिए जिसे मुलायम बढ़ावा दे रहे हैं.
मात्र 200 संतों की परिक्रमा को रोकने के लिए हजारों की संख्या में सुरक्षाबल तैनात कर देना कहीं से भी स्वाभाविक नहीं लगता. वस्तुतः देश की राजनीति जिस दिशा में जा रही है, उसमे मुलायम को यह अंदेशा है कि उनका मजबूत मुस्लिम वोटबैंक कांग्रेस की तरफ जा सकता है. इस नुकसान को रोकने के लिए वे पुनः अपने मौलाना वाले अवतार में जाना चाहते हैं और अपनी राजनीति साधने के लिए हिन्दू संतों को एक प्रकार से दंगाई घोषित करने पर तुले हुए हैं.
उल्लेखनीय है कि प्रस्तावित चौरासी कोस परिक्रमा विश्व हिन्दू परिषद के तत्वाधान में होने जा रही है. विश्व हिन्दू परिषद का यह घोषित एजेंडा है कि वे अयोध्या में रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण चाहते हैं. चौरासी कोस परिक्रमा और आगे के कार्यक्रमों में विश्व हिन्दू परिषद इसके लिए जनमत जुटाने का प्रयास करेगी. मंदिर के लिए जनमत खड़ा करना कोई गैरकानूनी कार्य नहीं है. विश्व हिन्दू परिषद नब्बे के दशक में भी मंदिर के समर्थन में जनमत खड़ी कर चुकी है. रामजन्मभूमि पर मंदिर पुनर्निर्माण के लिए विगत 480 वर्षों से संघर्ष जारी है. 2010 के इलाहबाद उच्च न्यायलय के निर्णय से तो यह स्पष्ट हो चूका है कि विवादित भूमि ही राम की जन्मभूमि है. आदर्श स्थिति तो यही होती कि वह भूमि मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं को सौंप दिया जाता. किन्तु मामला अब उच्चतम न्यायलय में है. उच्च न्यायलय से तो निर्णय आने में 60 वर्ष लग गए. संभव है कि उच्चतम न्यायलय में यह विषय 120 वर्ष तक लटका रहे. यह भी सम्भावना है कि 120 वर्षों बाद भी जब निर्णय आये तो न्यायालय में अपील दाखिल कर दी जाए और इस विषय पर अंतिम निर्णय 240 वर्षों बाद भी नहीं आये. हमारे न्याय व्यवस्था की जो स्थिति है उसमे कुछ भी असंभव नहीं है.
इसतरह यह तो लगभग स्पष्ट है कि रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण संसद में कानून बनाकर ही हो सकता है. संसद में कानून बनाने के लिए यह आवश्यक है कि वहाँ 272 रामभक्त संसद चुनकर भेजे जाएँ. आखिर बाबर के भक्त तो राम मंदिर पर आनेवाले विधेयक को समर्थन देंगे नहीं. देश में अबतक अधिकतम 200 ऐसे सांसद ही पहुँच सके हैं जो स्पष्ट रूप से भव्य मंदिर के पक्ष में खड़े थे. ऐसे में विश्व हिन्दू परिषद और संत समाज ऐसा जनमत खड़ा करना चाहती है जो 272 रामभक्त सांसदों को लोकसभा में पहुँचा सके. संतों की चिंता का कारण मंदिर मात्र ही नहीं है. भारत हिंदुओं के लिए पितृभूमि के साथ पुण्यभूमि भी है जिसकी चतुर्दिक दुर्दशा से देश के संत भी व्यथित हैं. जनजागरण और सामाजिक उत्थान के लिए यात्राओं का हमारे संतो का लंबा इतिहास रहा है. सनातन परंपरा की रक्षा के लिए आदिगुरु शंकराचार्य ने अखंड भारत को दो बार नापा था.
रामजन्मभूमि का मुद्दा न तो संतों के लिए राजनीतिक है न विश्व हिन्दू परिषद के लिए. यद्यपि जब भी आवश्यक हुआ है आदिकाल से ही संतों ने राजनीति को जनहित और राष्ट्रहित में प्रभावित करने का प्रयास भी किया ही है. अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्व वाली सरकार जब मंदिर मुद्दे का समाधान नहीं निकाल सकी तो विश्व हिन्दू परिषद ने उनकी तीखी आलोचना भी की और उनके सरकार के विरुद्ध आंदोलन भी हुए. मंदिर के आंदोलन से जुड़े अधिकतर संत और नेता अपने जीवन के आठवें और नवें दशक में हैं. उनके लिए एक तरह से यह अंतिम मौका है. यदि उत्तरप्रदेश सरकार चौरासी कोसी परिक्रमा को डंडे के बल पर रोक भी देती है तो आने वाले कुछ महीनों में अन्य आन्दोलनों के लिए देश को तैयार रहना चाहिए.

हिन्दू विभाजित है किन्तु पौरुषविहीन नहीं है. उसके प्राथमिकता की सूचि में ‘हिन्दू’ सबसे ऊपर न आता हो किन्तु बना हुआ अवश्य है. रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर हिंदुओं के लिए आज एकमात्र मुद्दा भले न हो लेकिन यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा अवश्य है. स्वघोषित सेकुलर दलों के मुस्लिम तुष्टिकरण से देश का युवा वर्ग व्यथित और सशंकित है. साधू-संतों के साथ यदि दुर्व्यवहार हुआ तो इसका दुष्परिणाम उत्तरप्रदेश में मुलायम और देश में कांग्रेस को भी भुगतना पड़ सकता है. कहीं ऐसा न हो कि मौलाना मुलायम के हाथ में मुसलमान तो रह जाए लेकिन हिन्दू ही निकल जाए. यदि कभी ऐसा होगा तो फिर मुसलमान के नेता मियां आजम खान होंगे और मुलायम उनकी पालकी उठाते नजर आयेंगे.

Monday, August 20, 2012

जलता रहेगा बोडोलैंड


जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू हुए असम दंगों की आग अब तक ठंढी नहीं हुई है. ऐसा भी नहीं कि यह आग असम तक ही सिमित रही है, इसका धुँआ पूरे देश में उठ रहा है. मुंबई के आजाद मैदान में जो तांडव हुआ, तालिबानी धमकियों के बाद उत्तर-पूर्व के लोगों का जिस तरह से पलायन हुआ, जिस तरह से लखनऊ में पत्रकारों की धुनाई हुई, उससे यह स्पष्ट है कि मामला खत्म नहीं हुआ है. ऐसे में देश के वामपंथी किस्म के ‘बुद्धिजीवी’ वर्ग में जो चुप्पी ‘साम्प्रदायिक सौहार्द’ बनाये रखने के नाम पर छाई हुई है वह वास्तव में छलावा है. 

बोडोलैंड में हुई हिंसा, देश में (विशेषकर उत्तर भारत) सैकड़ों वर्षों से चले आ रहे हिन्दू-मुस्लिम दंगों की एक कड़ी भर नहीं है. यह ताजिया या विजयादशमी के जुलुस के समय होने वाली हिंसा नहीं है. यह भावनात्मक कम और ठोस कारणों से उपजी हिंसा अधिक है. यहाँ मुद्दा जमीन का है, अवसरों का है और अवैध घुसपैठ के कारण स्थानीय संस्कृति पर हुए हमले का है. यहाँ मुद्दा आत्मसम्मान का है. यह स्पष्ट है कि ‘साम्प्रदायिक सौहार्द’ चुप रहने से नहीं, समस्या के स्थायी एवं न्यायपूर्ण समाधान से ही बन सकेगा.

क्या अगले कुछ दिनों में बोडो आदिवासियों के जमीन से अवैध कब्जे हट जायेंगे? क्या बोडो आदिवासियों की शिकायतें दूर हो गई हैं या हो जाने वाली हैं? क्या भारत – बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ रोकने की उचित व्यवस्था कर दी गई है? स्पष्ट है कि ऐसा कुछ न हुआ है और न होने जा रहा है. समस्या बनी हुई है और केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक की इच्छा अधिक से अधिक दंगापूर्व की स्थिति को कायम करने की है. इस क्षेत्र में अविश्वास और घृणा की खाई अत्यधिक बड़ी हो चुकी है. इन परिस्थितयों में बोडोलैंड फिर कब जल उठे, कब उसकी आग असम के दूसरे क्षेत्रों तथा पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में फ़ैल जाये, कब अलगाववादी संगठन इस अवसर का उपयोग भारत विरोधी भावनाओं को भडकाने के लिए करें, इसका क्या भरोसा?

दिल्ली, मुंबई में बैठे लोगों को ऐसा लगता है कि बांग्लादेश के अवैध घुसपैठ का अर्थ सस्ते मजदूरों की उपलब्धता, छोटे अपराधों की संख्या में वृद्धि और अवैध झोपड़पट्टियों की संख्या में वृद्धि भर है. लेकिन बेरोजगारी, गरीबी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और जनसँख्या के ऊँचे घनत्व के दबाव से जूझ रहे असम और पश्चिम बंगाल में इसका अर्थ जीवित रहने के सिमित मौकों में भी सेंधमारी है.

वैसे तो मुस्लिम संगठनों की मांग है कि बोडो स्वायत्तपरिषद के प्रावधान को ही खत्म किया जाये. लेकिन वे उन जिलों को तो बोडोलैंड से बाहर रखने के लिए कृतसंकल्प हैं जो अब बोडो बहुल नहीं रहे. प्रथमदृष्टया यह उचित मांग लगती है लेकिन सोचिए कि अवैध घुसपैठ से पहले जनसांख्यिकी संतुलन को बदल दिया जाये और फिर उसी को आधार बनाकर बोडोलैंड को लगातार छोटा करते रहें तो चार जिलों वाले इस स्वायत्तपरिषद को समाप्त होने में भला कितना समय लगेगा? बोडो संस्कृति का क्या होगा? कैसे बचेगी उनकी भाषा? क्या अपने ही देश में वे शरणार्थी बनकर रहेंगे?
  
उत्तर-पूर्व में ‘मुख्यभूमि’ के लिए यह शिकायत रही है कि उनकी सोच और संवेदना कोलकाता तक आकर समाप्त हो जाती है और उत्तर-पूर्व का दर्द उन्हें उद्वेलित नहीं करता. ऐसेमें यह समय है उनके साथ खड़े होने का और उनके उचित मांगों को समर्थन देने का. बोडोलैंड की आवाज दिल्ली के सत्ता के गलियारों में नहीं पहुँच पाती है. ऐसे में यह जरूरी है कि आप उनकी आवाज़ बने. 

आग बुझी नहीं है, असम एक ज्वालामुखी पर बैठा है और सरकार का यही रवैया रहा तो इस बार अकल्पनीय हिंसा का शिकार होगा असम. इस आग के पूरे उत्तर-पूर्व में फैलने की भी पूरी संभावना है. और यह दावा कोई नहीं कर सकता कि उसका असर दिल्ली, मुंबई और दूसरे महानगरों को नहीं जलाएगी (आजाद मैदान, मुंबई में हुई हिंसा, उत्तर-पूर्व के निवासियों का पलायन और लखनऊ में पत्रकारों की नमाजियों द्वारा जबरदस्त धुनाई ने भविष्य की तस्वीरें स्पष्ट कर दी हैं). इसबार हमें विस्मृति का शिकार नहीं होना है.

जलता रहेगा बोडोलैंड


जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू हुए असम दंगों की आग अब तक ठंढी नहीं हुई है. ऐसा भी नहीं कि यह आग असम तक ही सिमित रही है, इसका धुँआ पूरे देश में उठ रहा है. मुंबई के आजाद मैदान में जो तांडव हुआ, तालिबानी धमकियों के बाद उत्तर-पूर्व के लोगों का जिस तरह से पलायन हुआ, जिस तरह से लखनऊ में पत्रकारों की धुनाई हुई, उससे यह स्पष्ट है कि मामला खत्म नहीं हुआ है. ऐसे में देश के वामपंथी किस्म के ‘बुद्धिजीवी’ वर्ग में जो चुप्पी ‘साम्प्रदायिक सौहार्द’ बनाये रखने के नाम पर छाई हुई है वह वास्तव में छलावा है. 

बोडोलैंड में हुई हिंसा, देश में (विशेषकर उत्तर भारत) सैकड़ों वर्षों से चले आ रहे हिन्दू-मुस्लिम दंगों की एक कड़ी भर नहीं है. यह ताजिया या विजयादशमी के जुलुस के समय होने वाली हिंसा नहीं है. यह भावनात्मक कम और ठोस कारणों से उपजी हिंसा अधिक है. यहाँ मुद्दा जमीन का है, अवसरों का है और अवैध घुसपैठ के कारण स्थानीय संस्कृति पर हुए हमले का है. यहाँ मुद्दा आत्मसम्मान का है. यह स्पष्ट है कि ‘साम्प्रदायिक सौहार्द’ चुप रहने से नहीं, समस्या के स्थायी एवं न्यायपूर्ण समाधान से ही बन सकेगा.

क्या अगले कुछ दिनों में बोडो आदिवासियों के जमीन से अवैध कब्जे हट जायेंगे? क्या बोडो आदिवासियों की शिकायतें दूर हो गई हैं या हो जाने वाली हैं? क्या भारत – बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ रोकने की उचित व्यवस्था कर दी गई है? स्पष्ट है कि ऐसा कुछ न हुआ है और न होने जा रहा है. समस्या बनी हुई है और केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक की इच्छा अधिक से अधिक दंगापूर्व की स्थिति को कायम करने की है. इस क्षेत्र में अविश्वास और घृणा की खाई अत्यधिक बड़ी हो चुकी है. इन परिस्थितयों में बोडोलैंड फिर कब जल उठे, कब उसकी आग असम के दूसरे क्षेत्रों तथा पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में फ़ैल जाये, कब अलगाववादी संगठन इस अवसर का उपयोग भारत विरोधी भावनाओं को भडकाने के लिए करें, इसका क्या भरोसा?

दिल्ली, मुंबई में बैठे लोगों को ऐसा लगता है कि बांग्लादेश के अवैध घुसपैठ का अर्थ सस्ते मजदूरों की उपलब्धता, छोटे अपराधों की संख्या में वृद्धि और अवैध झोपड़पट्टियों की संख्या में वृद्धि भर है. लेकिन बेरोजगारी, गरीबी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और जनसँख्या के ऊँचे घनत्व के दबाव से जूझ रहे असम और पश्चिम बंगाल में इसका अर्थ जीवित रहने के सिमित मौकों में भी सेंधमारी है.

वैसे तो मुस्लिम संगठनों की मांग है कि बोडो स्वायत्तपरिषद के प्रावधान को ही खत्म किया जाये. लेकिन वे उन जिलों को तो बोडोलैंड से बाहर रखने के लिए कृतसंकल्प हैं जो अब बोडो बहुल नहीं रहे. प्रथमदृष्टया यह उचित मांग लगती है लेकिन सोचिए कि अवैध घुसपैठ से पहले जनसांख्यिकी संतुलन को बदल दिया जाये और फिर उसी को आधार बनाकर बोडोलैंड को लगातार छोटा करते रहें तो चार जिलों वाले इस स्वायत्तपरिषद को समाप्त होने में भला कितना समय लगेगा? बोडो संस्कृति का क्या होगा? कैसे बचेगी उनकी भाषा? क्या अपने ही देश में वे शरणार्थी बनकर रहेंगे?
  
उत्तर-पूर्व में ‘मुख्यभूमि’ के लिए यह शिकायत रही है कि उनकी सोच और संवेदना कोलकाता तक आकर समाप्त हो जाती है और उत्तर-पूर्व का दर्द उन्हें उद्वेलित नहीं करता. ऐसेमें यह समय है उनके साथ खड़े होने का और उनके उचित मांगों को समर्थन देने का. बोडोलैंड की आवाज दिल्ली के सत्ता के गलियारों में नहीं पहुँच पाती है. ऐसे में यह जरूरी है कि आप उनकी आवाज़ बने. 

आग बुझी नहीं है, असम एक ज्वालामुखी पर बैठा है और सरकार का यही रवैया रहा तो इस बार अकल्पनीय हिंसा का शिकार होगा असम. इस आग के पूरे उत्तर-पूर्व में फैलने की भी पूरी संभावना है. और यह दावा कोई नहीं कर सकता कि उसका असर दिल्ली, मुंबई और दूसरे महानगरों को नहीं जलाएगी (आजाद मैदान, मुंबई में हुई हिंसा, उत्तर-पूर्व के निवासियों का पलायन और लखनऊ में पत्रकारों की नमाजियों द्वारा जबरदस्त धुनाई ने भविष्य की तस्वीरें स्पष्ट कर दी हैं). इसबार हमें विस्मृति का शिकार नहीं होना है.

जलता रहेगा बोडोलैंड


जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू हुए असम दंगों की आग अब तक ठंढी नहीं हुई है. ऐसा भी नहीं कि यह आग असम तक ही सिमित रही है, इसका धुँआ पूरे देश में उठ रहा है. मुंबई के आजाद मैदान में जो तांडव हुआ, तालिबानी धमकियों के बाद उत्तर-पूर्व के लोगों का जिस तरह से पलायन हुआ, जिस तरह से लखनऊ में पत्रकारों की धुनाई हुई, उससे यह स्पष्ट है कि मामला खत्म नहीं हुआ है. ऐसे में देश के वामपंथी किस्म के ‘बुद्धिजीवी’ वर्ग में जो चुप्पी ‘साम्प्रदायिक सौहार्द’ बनाये रखने के नाम पर छाई हुई है वह वास्तव में छलावा है. 

बोडोलैंड में हुई हिंसा, देश में (विशेषकर उत्तर भारत) सैकड़ों वर्षों से चले आ रहे हिन्दू-मुस्लिम दंगों की एक कड़ी भर नहीं है. यह ताजिया या विजयादशमी के जुलुस के समय होने वाली हिंसा नहीं है. यह भावनात्मक कम और ठोस कारणों से उपजी हिंसा अधिक है. यहाँ मुद्दा जमीन का है, अवसरों का है और अवैध घुसपैठ के कारण स्थानीय संस्कृति पर हुए हमले का है. यहाँ मुद्दा आत्मसम्मान का है. यह स्पष्ट है कि ‘साम्प्रदायिक सौहार्द’ चुप रहने से नहीं, समस्या के स्थायी एवं न्यायपूर्ण समाधान से ही बन सकेगा.

क्या अगले कुछ दिनों में बोडो आदिवासियों के जमीन से अवैध कब्जे हट जायेंगे? क्या बोडो आदिवासियों की शिकायतें दूर हो गई हैं या हो जाने वाली हैं? क्या भारत – बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ रोकने की उचित व्यवस्था कर दी गई है? स्पष्ट है कि ऐसा कुछ न हुआ है और न होने जा रहा है. समस्या बनी हुई है और केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक की इच्छा अधिक से अधिक दंगापूर्व की स्थिति को कायम करने की है. इस क्षेत्र में अविश्वास और घृणा की खाई अत्यधिक बड़ी हो चुकी है. इन परिस्थितयों में बोडोलैंड फिर कब जल उठे, कब उसकी आग असम के दूसरे क्षेत्रों तथा पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में फ़ैल जाये, कब अलगाववादी संगठन इस अवसर का उपयोग भारत विरोधी भावनाओं को भडकाने के लिए करें, इसका क्या भरोसा?

दिल्ली, मुंबई में बैठे लोगों को ऐसा लगता है कि बांग्लादेश के अवैध घुसपैठ का अर्थ सस्ते मजदूरों की उपलब्धता, छोटे अपराधों की संख्या में वृद्धि और अवैध झोपड़पट्टियों की संख्या में वृद्धि भर है. लेकिन बेरोजगारी, गरीबी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और जनसँख्या के ऊँचे घनत्व के दबाव से जूझ रहे असम और पश्चिम बंगाल में इसका अर्थ जीवित रहने के सिमित मौकों में भी सेंधमारी है.

वैसे तो मुस्लिम संगठनों की मांग है कि बोडो स्वायत्तपरिषद के प्रावधान को ही खत्म किया जाये. लेकिन वे उन जिलों को तो बोडोलैंड से बाहर रखने के लिए कृतसंकल्प हैं जो अब बोडो बहुल नहीं रहे. प्रथमदृष्टया यह उचित मांग लगती है लेकिन सोचिए कि अवैध घुसपैठ से पहले जनसांख्यिकी संतुलन को बदल दिया जाये और फिर उसी को आधार बनाकर बोडोलैंड को लगातार छोटा करते रहें तो चार जिलों वाले इस स्वायत्तपरिषद को समाप्त होने में भला कितना समय लगेगा? बोडो संस्कृति का क्या होगा? कैसे बचेगी उनकी भाषा? क्या अपने ही देश में वे शरणार्थी बनकर रहेंगे?
  
उत्तर-पूर्व में ‘मुख्यभूमि’ के लिए यह शिकायत रही है कि उनकी सोच और संवेदना कोलकाता तक आकर समाप्त हो जाती है और उत्तर-पूर्व का दर्द उन्हें उद्वेलित नहीं करता. ऐसेमें यह समय है उनके साथ खड़े होने का और उनके उचित मांगों को समर्थन देने का. बोडोलैंड की आवाज दिल्ली के सत्ता के गलियारों में नहीं पहुँच पाती है. ऐसे में यह जरूरी है कि आप उनकी आवाज़ बने. 

आग बुझी नहीं है, असम एक ज्वालामुखी पर बैठा है और सरकार का यही रवैया रहा तो इस बार अकल्पनीय हिंसा का शिकार होगा असम. इस आग के पूरे उत्तर-पूर्व में फैलने की भी पूरी संभावना है. और यह दावा कोई नहीं कर सकता कि उसका असर दिल्ली, मुंबई और दूसरे महानगरों को नहीं जलाएगी (आजाद मैदान, मुंबई में हुई हिंसा, उत्तर-पूर्व के निवासियों का पलायन और लखनऊ में पत्रकारों की नमाजियों द्वारा जबरदस्त धुनाई ने भविष्य की तस्वीरें स्पष्ट कर दी हैं). इसबार हमें विस्मृति का शिकार नहीं होना है.

Thursday, April 7, 2011

अन्ना के संग हजार





कोलकाता के मेट्रो चैनल के पास लोग अन्ना हजारे के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे थे. संख्या हजारों में थी. अधिकतर युवा, शिक्षित अथवा कॉलेज जाने वाले विद्यार्थी! मैं भी अन्ना साहब को नैतिक समर्थन देने के लिहाज से वहाँ उपस्थित था. लेकिन जब वहाँ उपस्थित कुछ लोगों से जनलोकपाल बिल के बारे में उनके विचार पूछा तो उत्तर चौंकाने वाले थे. अधिकतर लोगों को जनलोकपाल बिल के बारे में कोई जानकारी हीं नहीं थी. किसी ने कहा कि अन्ना भ्रष्टाचार के विरुद्ध अनशन पर है. जिन्हें बिल के बारे में जानकारी थी उनकी जानकारी भी बेहद कम थी और वे भी बिल का विश्लेषण कर पाने कि स्थिति में नहीं थे. यानि अन्ना के पीछे मुस्तैद लोगों को असल में पता हीं नहीं कि वे लड़ाई क्या लड़ रहे हैं. और यही बात सोशल मीडिया (फेसबुक और ट्विटर) पर कांग्रेस अथवा कहें कि भ्रष्टाचार के समर्थक कह रहे हैं. लेकिन बस वही नहीं कह रहे हैं और भी लोग हैं सवालों के साथ. यद्यपि ध्यान देने वाली बात यह है कि अन्ना के आंदोलन और उनके साथ खड़े लोगों का महत्व इससे कम नहीं हो जाता है कि उन्होंने जनलोकपाल बिल का सूक्ष्म निरिक्षण नहीं किया है. बल्कि सिक्के का दूसरे पहलू यह है कि जनता भ्रष्टाचार से इतनी तंग आ गई है कि एक ईमानदार आदमी दिखा नहीं और बिना सवाल जवाब के उसके पीछे खड़ी हो गई. कोलकाता से लेकर चेन्नई तक और छोटे-छोटे कस्बों तक में लोग उनका समर्थन में आगे आ रहे हैं. जनता यदि इसे जनलोकपाल से अधिक भ्रष्टाचार के समूल विनाश कि लड़ाई मान रही है तो यह सुखद हीं है.
मैं अगर अपनी बात करूँ तो अभी तक तय नहीं कर सका हूँ कि अन्ना की मांग उचित है अथवा अनुचित. क्या यह सांसद के प्रतिष्ठा का हनन नहीं होगा कि एक प्रस्तवित बिल का मसौदा एक अधिकार प्राप्त कमिटी तैयार  करे जिसमे अनधिकृत लोग शामिल हों अर्थात जनता ने संवैधानिक तौर पर उन्हें यह अधिकार नहीं दिया हो. बेशक प्रत्येक बिल पर अपनी राय प्रकट करने का अधिकार देश की जनता को है लेकिन अधिकारप्राप्त कमिटी यदि संसद से बाहर हो और संसद को ऐसे प्रस्तावों  को पारित करने के लिए मजबूर किया जाये तो क्या यह एक गलत परिपाटी कि शुरुआत नहीं होगी. बेशक हमारे नेता विश्वास के योग्य नहीं है लेकिन उन्हें निर्वाचित तो जनता ने हीं किया है. बेशक अन्ना हजारे और उनके साथियों की विश्वसनीयता हमारे नेताओं से अधिक है लेकिन उनका किसी कानून बनाने वाली समिति में अधिकारपूर्वक प्रवेश करने की जिद्द लोकतंत्र का हनन और संसदीय राजनीति का अपमान नहीं तो और क्या है?
यदि जनलोकपाल बिल की बात करें तो यह भी कोई अमृत का घड़ा नहीं है. यह लोकायुक्त को असीमित शक्ति देता है. भला यह कौन निश्चित करेगा कि वह अपने शक्ति का दुरुपयोग नहीं करेंगे. क्या यह सामानांतर सत्ता नहीं होगी. हमारी सरकार और सांसद तो फिर भी 5 वर्षों के बाद जनता को जवाब देने आते हैं लेकिन यदि लोकायुक्त मनमानी करे तो उसे भला किसकी जवाबदेही है?
लेकिन फिर सोचता हूँ कि जब पिछले 60 सालों में संसदीय राजनीति भ्रष्टाचार की जननी हीं प्रमाणित हुई है तो फिर उसके अवमूल्यन का दोष जनता का कैसा? जब किसी एक घोटाले में देश के प्रत्येक नागरिक के जेब से लगभग 1700 रुपये निकाल लिया जाता है. जब अवैध रूप से खनिजों की खुदाई में हमारे नेता और मंत्री कर्णाटक और आँध्रप्रदेश की सीमा तक भूल जाते हैं, जब भाजपा से लेकर कांग्रेस तक के रेड्डी एक हीं तरह के नजर आते हैं. जब कॉमनवेल्थ खेलों में टॉयलेट पेपर से लेकर टिकट बेचने तक में धांधली करनेवाला इसी संसद का सदस्य हो, जब बलात्कार से लेकर अपहरण और हत्या से लेकर तस्करी तक के आरोपी संसद की शोभा बढ़ा रहे हैं, जबकि अन्य देश में हत्या का आरोपी और एक विदेशी नागरिक तक लोकतंत्र के इस मंदिर में पुजारी रह चूका है जब इसी संसद के सदस्य नोटों से ख़रीदे और बेचे जाते हैं तो फिर उस पर नकेल कसने कि जिम्मेवारी भी उसे हीं कैसे सौंपी जा सकती है. कुल मिलाकर जब संसद ने स्वयं हीं अपनी प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को तार-तार कर दिया है तो उसके विशेषाधिकार की चिंता अब कौन करे?
यदि लोकायुक्त द्वारा अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने का भय है तो क्या संप्रग सरकार समर्थन जुटाने के लिए सीबीआई का दुरुपयोग नहीं करती? किसे नहीं पता कि क्यों मुलायम और मायावती उत्तर प्रदेश में तो सांप और नेवले की लड़ाई लड़ते हैं लेकिन 10 जनपथ के चौखट पर एक साथ नाक रगड़ते हैं?
लगभग यही सवाल दौर रहे हैं और जवाब भी कुछ ऐसे हीं है और कमाल की बात है कि दोनों पक्ष हीं पूरी तरह सही है और किसी एक को भी नकारना बिल्ली को देखकर कबूतर के आँख बन्द करने जैसा है.
कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि अन्ना हजारे दूसरे जयप्रकाश नारायण (जेपी) साबित होंगे और अधूरे सम्पूर्ण क्रांति को सम्पूर्ण करेंगे. लेकिन यकीन मानिये ऐसा होगा नहीं क्योंकि आज परिस्थितियां भिन्न है. जेपी कि लड़ाई निरंकुश होती जा रही इंदिरा के खिलाफ था. लेकिन अन्ना भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं जिसके कीटाणु कमोबेश सभी पार्टियों में हैं. जेपी ने सत्ता परिवर्तन के रास्ते व्यवस्था परिवर्तन का सपना देखा था लेकिन अन्ना हजारे जनजागरण के रास्ते हीं व्यवस्था परिवर्तन की बात सोच सकते हैं. यानि अन्ना सीधे तौर पर सत्ता पर हमला कर रहे हैं न कि सत्ताधारी पार्टी पर.
तो आखिर होगा क्या? सरकार अन्ना को अनसुना कर देगी? यह असंभव है. कांग्रेस को अच्छी तरह पता है कि अन्ना का आज की स्थिति में जंतरमंतर पर डटे रहना उसे कितना महंगा पड़ेगा. दूसरे यदि अन्ना को कुछ हो गया (भगवान न करे) तो फिर जो आग लगेगी उसमे 10 जनपथ भी जलेगा. उन्हें अन्ना को सुनना हीं होगा और एक समझौते पर पहुँचाना हीं होगा.
लेकिन इस लड़ाई कि सार्थकता इसी में है कि बात जनलोकपाल बिल तक न रहकर आगे तक जाये और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक माहौल बने. यानि जंतरमंतर इतना शक्तिशाली प्रतिक बने कि संसदीय राजनीति उसे नकार न सके. लेकिन जंतरमंतर भारतीय संसद का विकल्प बनने की कोशिश भी न करे. इसी में लोकतंत्र का भी हित है और देश का भी.

Sunday, June 20, 2010

भोपाल गैस त्रासदी – एक वृहद परिप्रेक्ष्य


भोपाल गैस त्रासदी पर नयायालय के फैसले ने देश में राजनीतिक तापमान कई गुना बढ़ा दिया है। ख़बरों के अकाल से जूझ रहे समाचार चैनलों और सड़क पर आकर सरकार का विरोध करने की शक्ति गवां  चुकी विपक्ष को जैसे कोई खजाना मिल गया।
26 वर्षों तक गहरी नींद में सोये हुए ये लोग अब सवाल कर रहे हैं की एंडरसन को भारत से भागने के लिए कौन जिम्मेवार है। मैं समझता हूँ की ये प्रश्न यदि 26 वर्ष पहले पूछे गए होते तो कई चेहरे बेनकाब होते। समझ में नहीं आता कर्तब्य पर तत्पर विपक्ष और मीडिया तब कहाँ थी। वास्तव में हमारे देश में अदालत के फैसले इतनी देर से आते हैं की न्याय मरहम की जगह नासूर बन जाता है। लगभग हर माह किसी जनहित याचिका के सन्दर्भ में सरकार और जनप्रतिनिधियों को कर्तब्य का पाठ पढ़ाने वाली अदालत कभी खुद से प्रश्न क्यों नहीं पूछती?
मैं इस बारे ज्यादा बात नहीं करूँगा की एंडरसन को भगाने के लिए जिम्मेवार कौन था अथवा किन कारणों से ऐसा किया, मैं इसके सन्दर्भ में हीं एक वृहद् समस्या को रेखांकित करना चाहता हूँ.
सवाल है की जब सरकार यह मानती है की एंडरसन भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेवार है तो फिर उसे देश से बाहर जाने क्यों दिया गया। जरा सत्ताधारी कांग्रेस के बयान तो सुनिए - कानून मंत्री वीरप्पा मोइली कहते हैं की एंडरसन की रिहाई के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के सचिव पि सी अलेक्जेंडर जिम्मेवार हैं. वित्त मंत्री प्रणब मुख़र्जी कहते हैं की अर्जुन सिंह ने दंगा होने के भय से एंडरसन को भोपाल के बाहर जाने की अनुमती दी।
मैं माननीय कानून मंत्री से यह जानना चाहता हूँ की अगर अलेक्जेंडर ने अपनी मर्जी से एंडरसन को देश छोड़ने की अनुमति दी तो क्या इससे ये प्रमाणित नहीं होता कि अलेक्जेंडर प्रधानमंत्री के कार्यालय में बहुत अधिक शक्तिशाली थे और प्रधानमंत्री ने बेहद महत्वपूर्ण फैसले भी करने के अधिकार उन्हें दे दिए थे जो कहीं न कहीं राजीव की अक्षमता को भी दर्शाता है। अब अगर प्रणब बाबू की बात माने तो भोपाल के बाद, क्या सीधे अमेरिका हीं है जहाँ एंडरसन को भेजा जा सकता था। यदि किसी अनहोनी का भय था तो एंडरसन को दिल्ली या किसी अन्य गुप्त जगह पर भी रखा जा सकता था। यदि किसी अनहोनी का भय हीं एंडरसन के मुक्ति का कारण है तो मैं समझता हूँ की कसाब को फ़ौरन उसके देश भेज देना चाहिए। जब उसके सभी प्रकार के अपील पर अंतिम फैसला आ जाये तो उसे बुला कर फांसी अथवा जो भी अन्य सजा तय हो वह दे दी जाये। आश्चर्य होता है वरिष्ठ नेताओं के मुह से ये बातें सुन कर!
सवाल तो विपक्ष से भी है। क्यों विपक्ष 26 सालों से चुप था? लगभग 10 सालों के लिए उन्हें भी टुकड़ों में हीं सही, सत्ता तो मिली थी। तभी जाँच कर लिया होता की भला एंडरसन को क्यों अमेरिका लौटने दिया गया तो अर्जुन के मुंह खोलने की प्रतीक्षा किसी को न होती।
हमारे न्यायलय तो किसी भी टिका टिपण्णी के दायरे से बाहर हैं लेकिन क्या उन्हें खुद से यह पूछना जरूरी नहीं लगता की क्यों न्याय से न्यायलय का रिश्ता टूटता हुआ सा है। 1984 के सिख दंगो पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है। रुचिका गिरहोत्रा के मामले में तथाकथित न्याय को देखने से पहले उसे आत्महत्या कर लेना पड़ा। 26 वर्षों के बाद भोपाल गैस कांड में सजा और जमानत का फैसला एक साथ आया। मेरा मानना है की यदि आपके पास पैसे की ताकत है और अपने 35 वर्ष की उम्र के बाद कोई अपराध किया है तो देश की अदालात आपको सजा नहीं दे पायेगी। अंतिम फैसला आने के पहले आप परलोक सिधार चुके होंगे और इश्वर के अदालत में हीं आपका फैसला हो सकेगा।
मीडिया के बारे आजकल सर्वाधिक महत्वपूर्ण चर्चा तो पेड़ न्यूज़ को लेकर है। पेड़ न्यूज़ यानि पैसे लेकर खबर छपने की प्रथा। अब जहाँ पैसे लेकर खबरे छपती हों या दिखाई जाती हो वहां से तथ्य मिलने की उम्मीद कैसे करें। समाचार चैनलों के अपने दर्शक हैं और वह उन्ही के पसंद और नापसंद के हिसाब से चिल्लाता है। उसके लिए जिंदगी की कीमत भी उसके जेब के हिसाब से है। आप बस हाल में हीं हुई दो दुर्घटनाओं की तुलना करिए सब कुछ साफ़ हो जायेगा। मंगलौर में हुए प्लेन क्रैश को और पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में उडाये गए ट्रेन को मिले कवरेज की तुलना कीजिये। मंगलौर प्लेन क्रैश एक दुर्घटना थी, जिसके लिए कोई भी सीधे तौर पर दोषी नहीं था। जबकि मिदनापुर में हुआ ट्रेन धमाका एक सुनियोजित अपराध, लेकिन जो महत्व समाचार चैनलों ने प्लेन क्रैश को दिया उसका एक चौथाई भी ट्रेन धमाका को नहीं मिला। वास्तव में फर्क दोनों जगह मरने वालों के जेब में है। एक वर्ग उपभोक्ता है, इन चैनलों में दिखने वाले विज्ञापनों के उत्पाद का और दूसरा अभी भी सरकारी राशन दुकान से चावल उठता है। एक लोकप्रिय समाचार चैनल पर प्राइम टाइम में खबर आ रही थी की अमिताभ बच्चन एक टीवी शो फिर से होस्ट करने जा रहे हैं। लगभग 30 मिनट तक यह खबर चलती रही। बॉटम में एक खबर फ्लैश हो रहा था - पश्चिम बंगाल के किसी गाँव में भूख से एक हिं परिवार के तीन लोगो की मौत। अमिताभ बच्चन के शो के लिए ३० मिनट और भूख से मरते इंसान की खबर बॉटम में दिखाकर कर्तब्य की इतिश्री! आखिर महीने में एक लाख रुपये की सैलरी पाने वाला भारत ऐसी खबर सुनकर अपनी शाम क्यों ख़राब करे? और भूख से मरने वाले लोग न तो अखबार पढ़ते हैं न टीवी देखते हैं.
सरकार कह रही है कि हम एंडरसन के प्रत्यर्पण की कोशिश कर रहें हैं लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका सार्वजनिक मंचो से भारत को अपना सबसे प्रिय और भरोसेमंद मित्र बताता है। अमेरिका के राष्ट्रपति भारत के लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था की प्रशंसा करते नहीं अघाते तो फिर वो भारत के लोकतान्त्रिक सरकार के इस मांग को क्यों नकार रहे हैं?
अख़बारों में एक खबर पढ़ा था की अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन जो इंदिरा गाँधी की समकालीन भी थे, उन्होंने एक नोट में इंदिरा गाँधी के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया था। इंदिरा वैश्विक मामलों में किसी की सुनती नहीं थीं इसलिए अमेरिका से उनके रिश्ते कभी भी अच्छे नहीं रहे। वास्तव में तीसरी दुनिया के एक देश की प्रधानमंत्री उस वक्त इतनी मजबूत थी की विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली देश के प्रसाशक उनसे इस हद तक परेशान हो जाते थे कि अपना आप खो बैठते थे। आज जबकि हम विश्व के महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति में से एक हैं, जबकि हमारी सैन्य शक्ति किसी से कम नहीं तो हम विदेश नीति में अमेरिका के पदचिन्हों को अपना रास्ता बना चुके हैं। हमारे लिए आर्थिक तरक्की हीं सरकार का अर्थ रह गया है। भारत सरकार एक देश की सरकार कम और किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी की निदेशक मंडल अधिक दिखती है। ऐसे में अमेरिका भला क्यों सुने भारत की और क्यों हो एंडरसन का प्रत्यर्पण।
निराशा के इस दौर में उम्मीद है युवा वर्ग! लेकिन क्या यह युवा किसी परिवर्तन का सारथी बनने को तैयार है? आप सोशल नेटवर्किंग साइटों पर जाएँ। इनके लिए तो 25,000 लोगों की मौत एक हंसाने और जोक्स बनाने के साधन है। कहीं एक पोस्ट देखा - भोपाल गैस त्रासदी को राजीव गाँधी जनसँख्या नियंत्रण योजना नाम देना चाहिए। लगभग एक सौ से अधिक जवाब थे उस पोस्ट पर। एक छोटी सी चीज काफी कुछ बयान कर जाती है। मनमोहन सरकार के दौर में जवान हुई और हो रहे ये युवा भारतीय होने का अर्थ भी नहीं जानते हैं। पश्चिमी देशों में राष्ट्रवाद को लेकर कोई विशेष आग्रह नहीं दीखता। यही अब हमारे यहाँ भी दिख रहा है। लेकिन यह दक्षिण एशिया में कारगर नहीं हो सकता। आप खुद सोचिये जिस आसानी से एक ब्रिटिश नागरिक स्पैनिश हो सकता है क्या वैसे हीं एक भारतीय भी पाकिस्तान का नागरिक हो सकता है या फिर कोई पाकिस्तानी भारतीय नागरिक हो सकता है? बेशक जवाब सिर्फ न में हीं हो सकता है।
वास्तव में भोपाल गैस त्रासदी और उसका प्रबंधन, उदाहरण है- हमारे व्यवस्था के असफल होने का, हमारी न्यायालयों के कर्तब्यविमुखता का, हमारे नेताओं के संवेदनहीनता का, और स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ होने का दावा करने वाले मीडिया के अवसरवादिता का। यह संकेत भी है एक राष्ट्र के तौर पर कहीं रीढविहीन होते जाने का। क्योंकि भोपाल गैस त्रासदी 3 दिसम्बर, 1984 से कहीं ज्यादा बाद के 26 वर्षों में और भयावह होती गयी है।यह संकेत भी है है चकाचौंध के पीछे के भयंकर अन्धकार को देखने का जो आज नहीं तो कल सामने तो आएगा जरूर।

Friday, April 23, 2010

माओवाद बनाम लोकतंत्र

माओवाद बनाम लोकतंत्र
ग्यारह तारीखअप्रैल (2010) महीने की बात है. मैं झारखण्ड के कोयलांचल क्षेत्र में ऑडिट के सिलसिले में गया हुआ था. मेरे साथ तीन और लोग थे.  हमलोग वहां कोल इंडिया के गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे. रविवार का दिन था और आज पूरा आराम था. सुबह करीब आठ बजे का वक्त रहा होगा. मैं बाहर लॉन में बैठकर अखबार पढ़ रहा था. पिछले मंगलवार को हीं नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा में सी.आर.पी.एफ. के सत्तर से अधिक जवानों को मार दिया था. इसलिए पूरा का पूरा अखबार इसी तरह के समाचारों से भरा पड़ा था. अभी अभी एक बंगाली भद्र पुरुष नक्सलवाद के समर्थन में जोरदार बहसबाजी कर के गए थे. लेकिन मैं देश के सैनिकों और अर्धसैनिक बलों की हत्या को राष्ट्रद्रोह मान कर उनके खिलाफ कड़ी कारर्वाई करने की वकालत कर रहा था. मैंने ऑपरेशन ब्लू स्टार का उदहारण दिया और वैसी हीं कार्यवाई की अपेक्षा जताई. भद्र पुरुष नाराज हो कर उठकर चल दिए और मैं अखबार पढ़ता रहा. 
सहसा मेरे पैरो के पास कुछ हलचल हुई.  देखा तो एक वृद्ध मेरे कुर्सी के निचे कुछ टटोल रहा था. तभी ध्यान आया कि मैं महुआ के पेड़ के निचे  बैठा हूँ और वह कुर्सी के चारो पैरों के मध्य से महुआ निकालने की कोशिश कर रहा है. परेशान होकर मैं वहां से उठ गया और अधिक दिमाग खपाए बिना नाश्ता करने अन्दर चला गया. करीब एक घंटे बाद जब वापस बाहर निकला तो देखा वह वृद्ध अपनी मेहनत की पूंजी समेटे अब जाने की तैयारी  कर रहा है. मैंने इस बार उसे ध्यान से देखा लगभग सत्तर साल उम्रपांच फीट  की लम्बाई, काली रंगत, झुकी हुई कमर और भावशून्य चेहरा - यही उस वृद्ध का व्यक्तित्व था. मुझे समझ आ गया कि यह झारखण्ड का आदिवासी यानि वनवासी यानि मूलनिवासी है. जितना महुआ उसने चुना था वह उसके धोती (जिसे लंगोटी कहना अधिक न्यायसंगत होगा) में बंधा हुआ था. मेरा बचपन गावं में बिता है और मैंने भी महुआ चुना है, यह अलग बात है कि महुआ चुनना मेरे लिए रोजी - रोटी  की जरूरत नहीं थी. किन्तु अपने लगभग 12 वर्ष पुराने अनुभव से भी मैं यह तो अनुमान लगाने में समर्थ हो हीं गया कि उसकी कमाई  इस भीषण महंगाई के दौर में भी 3 रुपये से अधिक तो नहीं हीं होगी. कांग्रेस के 'बिहारी-मुम्बैया' सांसद संजय निरुपम का लोकसभा में दिया गया भाषण याद आ गया. संजय ने कहा था "मेरा दिल नहीं मानता कि इस देश में अभी भी ऐसी गरीबी है जहाँ लोग २० रुपये या उससे कम में भी गुजरा कर रहे हैं". 
मैंने देखा वह बूढ़ा इंसान अब धीरे धीरे गेस्ट हाउस की सीढियां उतरकर जा रहा है. न जाने क्यों मन में उत्कंठा हुई और मैं उसके पीछे -पीछे कुछ दूर तक चला गया. मैं देखना चाहता था कि वह रहता कहाँ है. देखा तो वह एक पांच - छः फीट ऊँची मिटटी के दीवारों वाले एक कमरे के घर में घुसा. हे इश्वर!  यह इंसानों के रहने का घर है ? पांच फीट की मिटटी की दिवार, टूटी हुई खपरैल छत, पंखे और बल्ब की तो बात हीं बेमानी है. इस छोटी सी घटना ने मेरे मन मस्तिष्क को झकझोर दिया और मेरी सोच में व्यापक परिवर्तन हुआ.  
झारखण्ड, उडीसा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, और पश्चिम बंगाल का वह क्षेत्र जो नक्सलियों के अधिपत्य के लिए जाना जाता है वह वास्तव में खनिज सम्पदा के मामले में बेहद धनी है. लेकिन किसानों के लिए बेहद कम उपजाऊ. संभवतया  यह कोई वैज्ञानिक तथ्य होगा (बल्कि है भी) कि जिन क्षेत्रों में भी खनिज सम्पदा की अधिकता है वहां की भूमि कम उपजाऊ अथवा अनुपजाऊ है. अरब  देशों की जमीन  भी उपजाऊ नहीं है लेकिन जमीन के निचे दबे खनिज तेल ने तो उनकी किस्मत हीं बदल दी. लेकिन दुर्भाग्य से यह सब भारत के खनिज सम्पदा से भरे क्षेत्रों में नहीं हुआ. नक्सल प्रभावित क्षेत्र अथवा खनिज सम्पदा से भरे क्षेत्र के लोग आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछरे हैं तो यह अनायास नहीं है. दरअसल जब गंगा, जमुना, रावी, और गोदावाई जैसी और हीं नदियों के किनारे बसे लोग नदी तट के उपजाऊ भूमि से लाभान्वित हो कर विकास की राह पर  आगे बढ़ रहे थे तब आज के आदिवासी क्षेत्र जंगल के जीवन से निकल भी नहीं सके थे. क्योंकि अनुपजाऊ भूमि होने के कारण वे कृषि पर निर्भर नहीं हो सकते थे. उन्हें अपने जीवन यापन के लिए जंगल में उगने वाले कंद-मूल का हीं सहारा था. परिणामस्वरूप जब मैदानी भाग के लोग  आर्थिक और सामाजिक रूप से परिवर्तन के कई चक्र से निकल चुके थे, तब तक  आदिवासी सभ्यता के प्रथम प्रतिक शरीर ढकने के लिए कपडे के प्रयोग से भी अनजान थे. समय का चक्र बदला और सभ्य समाज ज्ञान से विज्ञान की दिशा में  चल पड़ा. विश्व ने औद्योगिक क्रांति भी देखा और जीवन के तौर तरीकों में आमूल परिवर्तन आया. लेकिन ज्ञान से विज्ञान के इस यात्रा में जो सर्वाधिक विशिष्ट  बात है वह ये कि सभ्य समाज को पहली बार अनुपजाऊ और असभ्य लोगों से भरे जंगलों से जुड़ने की जरूरत महसूस हुई. बड़ी तेजी से परिभाषाओं का परिवर्तन हुआ और जंगलपठार और रेगिस्तान महत्वपूर्ण हो गए. इस महत्व ने अरब देशों की  किस्मत बदल दी लेकिन भारत में यह त्रासदी बन गयी.
जब झारखण्ड, उड़ीसा, और छत्तीसगढ़ तथा अन्य जगहों पर खनिज पदार्थों  के बहुतायत की बात सामने आई तो वहां बाहरी लोगो का आवागमन बढ़ा. ऐसे में आदिवासिओं का पहली बार बाहरी लोगो से जुड़ाव हुआ. वास्तव में यह एक मौका था आदिवासी और गैरआदिवासी  का फर्क मिटाने का लेकिन व्यवस्था की अदूरदर्शिता के कारण ऐसा नहीं हो सका. बाहरी लोगो के आगमन ने आदिवासियों को पेड़ की छाल की जगह कपडा पहनने को प्रेरित (या यों कहें की मजबूर) तो जरूर किया लेकिन कपड़ा खरीदने के स्रोत नहीं आये. जंगल के जंगल साफ़ करके नए शहरों , कस्बों को बसाया गया ऐसे में कंद- मूल की जगह चावल, गेहूं जैसे अनाज हीं उनका भी मुख्य खाद्य पदार्थ तो बन गया लेकिन उनके लिए यह उपलब्ध नहीं हो सका. जहाँ जंगलों के उत्खनन ने उनसे पारंपरिक जीवन को छीन लिया वहीँ उनके आधुनिक जीवन पद्धति का कोई भी सुख मयस्सर नहीं हुआ. 
कोयला को काला हीरा ऐसे हीं नहीं कहते. इस कोयले की बदौलत कोल इंडिया भारत का दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है. इस कोयले की बदौलत झारखण्ड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के निर्जन वन में सैकडों स्कॉर्पियो, बोलेरो और दूसरी गाड़ियाँ दौडती हैं. इस कोयले के खेल के माहीर खिलाडी करोडो और अरबों में खेलते हैं और कोल माफिया कहलाने में गौरव महसूस करते हैं. लेकिन यही कोयला इन आदिवासिओं को दो वक्त की रोटी और एक साबूत छत नहीं दे पाया. इनके हिस्से आया महुआ का पेड़  और मिटटी की रिसती हुई झोपड़ी! कहना न होगा कि औद्योगिक क्रान्ति इनके लिए मुसीबतों के अतिरिक्त कुछ नहीं लायी.
यद्यपि संविधान ने आदिवासी बहुल क्षेत्रों को संसद तथा विधान सभा में आदिवासी लोगो के प्रतिनिधित्व के लिए सीटें आरक्षित भी किया है. लेकिन इसका कोई भी लाभ उन्हें नहीं मिला है. जहाँ दलित नेताओं ने तमाम कमियों के बावजूद दलितों के सामजिक उत्थान के लिए कुछ  न कुछ किया है. वहीँ आदिवासी नेताओं ने सिर्फ संसदीय भ्रष्टाचार और हर तरह की  राजनीतिक गन्दगी के नाले में जमकर डूबकी  लगाईं है. उदाहरण के लिए शिबू सोरेन का हीं नाम लें. शिबू राजनीति में आने के पहले आदिवासिओं के नायक थे. उन्होंने शराब के खिलाफ अभियान चलाया था. सूदखोर महाजन उनके नाम से कांपते थे. अपनी पूरी जवानी आदिवासियों के उत्थान और उनके मध्य फैले अंधविश्वास को मिटाने में बिताने के बाद शिबू  नायक से राजनेता बने तो दिल्ली की हवा ऐसी लगी कि संसद में वोट के बदले नरसिम्हा राव सरकार से पैसे लेकर लोकतंत्र को कलंकित किया. इस राज को छुपाने के लिए उनपर अपने हीं सचिव शशिनाथ झा के हत्या का भी आरोप लगा और इसमे उन्होंने जेल भी काटा. मधु कोड़ा की कहानी नयी है और इस बारे में अधिक कुछ बताने की जरूरत नहीं समझता. कभी कभी मुझे ऐसा  लगता है कि हमारे संसद और विधानसभाओं के दीवारों को बनाने में ईंट, सीमेंट, बालू के साथ किसी ऐसे तत्व का भी प्रयोग हुआ है जिसके संपर्क में आते हीं नेताओं में भ्रष्टाचार के कीटाणु का प्रवेश हो जाता है. पुलिस के साथ मिलकर छुटभैये नेता भी आदिवासियों पर हीं अत्याचार करने लगे. पुलिसिया अत्याचार के बारे में तो बस आप इतना हीं अंदाजा लगा लें कि जब चंडीगढ़ जैसे  शहर में एक उच्च मध्यवर्गीय परिवार की  रुचिका को न्याय के लिए २० सालों तक प्रतीक्षा करना पड़ा और उस तथाकथित बहुप्रचारित न्याय को देखने के पहले उसने पुलिस के दमन  से आहात  होकर  आत्महत्या कर लेना  अधिक उचित समझा  तब मीडिया से दूर अनपढ़ और निरीह आदिवासियों पर किस तरह के और किस हद तक पुलिसिया अत्याचार होते होंगे यह तो मात्र कल्पना कर के हीं आत्मा तक सिहर जाती है. पुलिस इन इलाकों में वर्षों अत्याचार का पर्याय रही है.
कहना न होगा कि इन आदिवासी बहुल क्षेत्रो  में लोकतंत्र कि रौशनी नहीं पहुंची और लोकतंत्र यहाँ असफल रहा. जब निरंकुश शासन तंत्र अथवा तानाशाही असफल होता है तब लोकतंत्र का जन्म होता है. लेकिन जब लोकतंत्र असफल होता है तो निराशा और विकल्पहीनता का जन्म  होता है. और ऐसे में अराजकता का माहौल बनता है. यही अराजकता आज हमारे यहाँ नक्सलवाद या माओवाद के नाम से उदित हुआ है. ये माओवादी नेता हैं जिन्होंने इन आदिवासिओं को  बताया है  कि वे कोई परग्रह प्राणी नहीं हैं बल्कि इसी मिट्टी  के बने हैं. इन्हें जो पहचान और अस्तित्व मिला है वह इस लिए कि आज वे हथियार लेकर उठ खड़े हुए हैं. आखिर लोकतंत्र को बहकाने की जिम्मेवारी उनपर क्यों जिन्हें लोकतंत्र की रौशनी से हमेशा दूर रखा गया. अब फिर “कानून व्यवस्था का राज” और “लोकतंत्र” अपना सन्दर्भ खोता है तो खो दे, लोकतंत्र की चिंता उनलोगों ने भी नहीं कि जो लोकतंत्र के नाम पर सत्ता पर एकाधिकार कर बैठे. लेकिन यह तो सिक्के का एक पहलू है.
ऊपर कहे गए शब्द नक्सलवाद को न्यायसंगत ठहराने की  कोशिश नहीं बल्कि माओवादी नेताओं के पीछे, आदिवासियों के खड़े होने की स्वाभाविकता को न्यायसंगत ठहराने की कोशिश है. आदिवासी मासूम हैं तो इसका अर्थ यह कतई नहीं कि उनके माओवादी नेता भी मासूम हैं. माओवाद साम्यवाद अथवा कम्युनिज्म  का हीं एक अतिवादी रूप है. माओवाद लोकतंत्र के लिए कितना खतरनाक हो सकता है इसके लिए मैं एक उदाहरण देना चाहूँगा. स्वतंत्रता के बाद जब देश में लोकतंत्र  लागू हुआ तब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा था कि हम लोकतन्त्र को नहीं मानते और जब भी और जहाँ भी मौक़ा मिलेगा हम लोकतंत्र को कमजोर करने और साम्यवाद को मजबूत करने की कोशिश करेंगे. पश्चिम बंगाल  में सत्ता प्राप्ति के बाद वाम मोर्चा ने ऐसा हीं किया भी. आज बंगाल में वाम मोर्चा ने जनता से  जुडी हर एक संस्था का राजनीतिकरण कर दिया है. लगभग तीस वर्षों तक लोकतंत्र पदच्युत रहा है बंगाल में. लोकतंत्र में हिस्सा लेने वाले साम्यवादियों को हम उदार साम्यवादी के श्रेणी में रख सकते हैं. जब उदार साम्यवाद इतना खतरनाक है तो फिर उग्र साम्यवाद जो कि माओवाद कहा जाता है वह कितना खतरनाक हो सकता है यह सोचने और समझने  की  जरूरत है. कम्युनिस्टों की जवाबदेही देश से अधिक विचारधारा के लिए हीं हमेशा रही  है. दुसरे विश्वयुद्ध के समय जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस  ने जर्मनी, जापान और इटली जैसे देशों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ जंग का एलान किया तो उसके विरोध में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र में एक कार्टून प्रकाशित हुआ था जिसमे हिटलर के हाथ में एक कुत्ते की डोर थी  और कुत्ते के मुंह की जगह नेताजी सुभाष का चेहरा लगा हुआ था. नेताजी का अपराध इतना हीं था कि सोवियत रूस तब इंग्लैंड को समर्थन दे रहा था और नेताजी इंग्लैंड के खिलाफ  देश की आज़ादी के लिए लड़ रहे थे. एक और उदाहरण है जो इससे भी अधिक शर्मनाक है. भारत - चीन  युद्ध के समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ नेताओं ने भारतीय सैनिकों के लिए रक्तदान शिविर का आयोजन किया था जो कि ज्यादातर कम्युनिस्ट नेताओं को पसंद नहीं आया (क्योंकि चीन एक कम्युनिस्ट देश था और कम्युनिस्ट देश के विरोध में लड़ाई को समर्थन देना कम्युनिज्म से धोखा करने जैसा था) और उन लोगो ने बगावत कर एक नई पार्टी का गठन किया जिसे हम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या माकपा के नाम से जानते हैं. ज्यादा दिलचस्प यह जानना होगा कि भारतीय सैनिकों के लिए रक्तदान शिविर का विरोध करनेवाला धड़ा आज अधिक मजबूत है. केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा तीनो  हीं कम्युनिस्ट शासित प्रदेश में सरकार माकपा के नेतृत्व में हीं है.
माओवाद चीज क्या है , इसे समझने के लिए आप एक कल्पना करिए. हम हमेशा पढ़ते और देखते हैं कि प्रसिद्ध समाजसेवी तथा लेखिका अरुंधती  रॉय माओवादी के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में जाती हैं उन्हें उत्साहित करती हैं और वापस दिल्ली तथा अन्य शहरों में आकर माओवादियों को न्यायसंगत ठहराती हैं तथा भारत सरकार के लिए यथासंभव कटु शब्दों का प्रयोग करती हैं. आप थोडा विपरीत सोचें, अरुंधती रॉय माओवादियों के गढ़ में जाती हैं, वहां माओवादियों को गलत और सरकार को सही ठहराने की कोशिश करती हैं. अगला दृश्य क्या होगा? क्या अरुंधती दिल्ली लौटकर कोई साक्षात्कार  दे पाएंगी? शायद आप सबको चीन के थेन्यमन चौक पर टैंक से कुचल दिए गए युवक याद आ रहे होंगे. लोकतंत्र कम से कम सार्वजनिक तौर पर आपको विरोध करने और काफी हद तक परिस्थितियों को बदलने का मौका तो देती है. लेकिन माओवाद............. 
वास्तविकता यह है कि माओवादी नेताओं का अपना एक अजेंडा है - भारत में खुनी क्रांति के रास्ते कम्युनिज्म या साम्यवाद को पदस्थापित करना. खुनी क्रांति के लिए उन्हें सेना की  जरूरत है और यही एक रिश्ता है उनका गरीब आदिवासियों से. इससे अधिक कुछ नहीं. याद आता  है नक्सलवाद के आदिपुरुष चारू मजुमदार के शब्द - चीन का चेयरमैन (माओ)  हमारा भी चेयरमैन. चारू  मजुमदार और उनके साथियों ने तो ट्रेनिंग भी चीन में हीं ली थी. कोई आश्चर्य नहीं कि उनकी फंडिंग चीन से भी होती हो.
तो फिर समाधान क्या है. मैं कहता हूँ, कोई समाधान  हीं नहीं है. क्या सरकार माओवादी नेताओं से बात करेगी? अव्वल तो माओवादी बात करने को तैयार नहीं होंगे (क्योंकि उन्हें आदिवासियों के दशा में सुधर करना नहीं है बल्कि व्यवस्था बदलना है)  और अगर बात किया भी तो ऐसी शर्त रखेंगे जो संभव हीं नहीं.  तो क्या सरकार माओवादी नेताओं को अलग रखकर आदिवासियों से बात करेगी. लेकिन वे न तो सरकार पर भरोसा करेंगे, न कथित मानवाधिकार संगठनो पर जो सिर्फ इस बात के लिए अमिताभ बच्चन पर मुकदमा दायर कर देते हैं हैं कि वे अपनी पुत्रवधू ऐश्वर्या से बेटे की अकांक्षा क्यों रखते हैं बेटी की क्यों नहीं.  माओवाद के साथ आदिवासी इतने कदम चल पड़े हैं कि अब हम उनके पीछे लौटने की बात सोच बड़ा मुश्किल है. 
अब जबकि फैसला हथियार से हीं होना है तो क्या होगा ? क्या सरकार लोकतंत्र के नाम पर आदिवासियों को लाश के ढेर में बदल देगी या फिर  उस वक्त तक प्रतीक्षा करेगी जब तक देश के एक बड़े हिस्से को  माओवादी, स्वायत्त क्षेत्र बनाने  की मांग करे या फिर उस वक्त तक जब तक कि देश में लोकतंत्र स्वप्न हीं बन जाए ? प्रत्येक  परिस्थिति में लोकतंत्र का हीं चीरहरण होने जा रहा है.